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बंगाल चुनाव और ‘खूनी’ विरासत : 20 साल से हर इलेक्शन में बहा लहू, डराने वाले हैं राजनीतिक हिंसा के ये आंकड़े

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Prabhat Khabar 24 अप्रैल 2026, 06:45 am
बंगाल चुनाव और ‘खूनी’ विरासत : 20 साल से हर इलेक्शन में बहा लहू, डराने वाले हैं राजनीतिक हिंसा के ये आंकड़े

WB Election Violence History: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में शांतिपूर्ण मतदान के लिए चुनाव आयोग ने पुख्ता इंतजाम किये हैं. सुरक्षा बलों के 2 लाख से अधिक जवानों को बंगाल में तैनात किया गया है. इसकी वजह यह है कि बंगाल की राजनीति का एक कड़वा सच है.

और वो सच यह है कि यहां लोकतंत्र का महापर्व अक्सर ‘लाल रंग’ में रंग जाता है. इसलिए एक बार फिर ‘हिंसा’ की चर्चा तेज हो गयी है. नंदीग्राम से संदेशखाली तक हजारों परिवारों को मिले गहरे जख्म पिछले दो दशकों (20 साल) का इतिहास उठाकर देखें, तो बंगाल में सत्ता का रास्ता बारूद और खून से होकर गुजरा है.

नंदीग्राम से लेकर संदेशखाली तक, राजनीतिक वर्चस्व की इस लड़ाई ने हजारों परिवारों को गहरे जख्म दिये हैं. आइए, जानते हैं बंगाल के उस खूनी इतिहास का पूरा ब्योरा, जिसने बंगाल के लोकतंत्र को जख्मी किया. जो आज भी मतदाताओं के मन में दहशत पैदा करता है. 20 साल का ‘खूनी’ सफर : लोकतंत्र पर भारी पड़ी हिंसा बंगाल में चुनावी हिंसा का सिलसिला किसी एक दल या काल तक सीमित नहीं रहा.

पिछले 20 वर्षों में हिंसा का स्वरूप और भी भयानक हुआ है. चुनावी रैलियां, नामांकन और मतदान के दिन अक्सर बमों के धमाके और गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंजते रहे हैं. 2006 से लेकर 2026 की दहलीज तक, बंगाल ने सत्ता के कई रंग देखे, लेकिन हिंसा का ‘लाल रंग’ हर चुनाव में हावी रहा.

बंगाल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें 2006-2011 : वामपंथी शासन का अंतिम दौर और संघर्ष 20 साल पहले के दौर में वाममोर्चा (Left Front) की पकड़ ढीली हो रही थी और ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) उसे चुनौती दे रही थी. नंदीग्राम और सिंगूर (2007-2008): ये 2 ऐसे क्षेत्र रहे, जिसने बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी.

लेकिन इन आंदोलनों के दौरान हुई हिंसा ने देश का ध्यान खींचा. भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के दौरान हुई हिंसा ने पूरे देश को हिला दिया था. नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग और उसके बाद राजनीतिक झड़पों में कई लोगों की जान गयी. इसे बंगाल में चुनावी हिंसा का सबसे काला अध्याय माना जाता है.

लालबाजार और केशियारी : पश्चिमी मेदिनीपुर और बांकुड़ा के इलाकों में राजनीतिक वर्चस्व की जंग में सैकड़ों कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुईं. इसे भी पढ़ें : बंगाल में लोकतंत्र की ‘सुनामी’, 74 साल का रिकॉर्ड टूटा, शाम 5 बजे तक 89.93 फीसदी मतदान, क्या यह महा-परिवर्तन की आहट? 2011 : ‘परिवर्तन’ का चुनाव और उम्मीदें वर्ष 2011 में जब ममता बनर्जी ने 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका, तो उम्मीद थी कि हिंसा का दौर थमेगा.

लेकिन, ‘बदला नहीं, बदलाव चाहिए’ के नारे के बावजूद चुनावी रैलियों में हिंसक घटनाएं जारी रहीं. सत्ता हस्तांतरण के समय भी कई जिलों में झड़पें हुईं. वामपंथी शासन के अंतिम वर्षों से लेकर तृणमूल कांग्रेस के वर्तमान शासन तक, चुनावी रैलियों में हिंसा आम बात रही.

इसे भी पढ़ें : बंगाल में तृणमूल समर्थकों ने भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, तस्वीरें और वीडियो वायरल 2018-2019: हिंसा का नया और भयावह स्वरूप पिछले 20 वर्षों में वर्ष 2018 के पंचायत चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव को सबसे हिंसक माना जाता है.

पंचायत चुनाव का काला अध्याय : बंगाल में विधानसभा से ज्यादा खौफनाक मंजर पंचायत चुनावों में दिखता है. वर्ष 2018 और 2023 के पंचायत चुनावों के दौरान हुई मौतों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किये थे. 2018 में बड़े पैमाने पर निर्विरोध जीत और नामांकन के दौरान भारी हिंसा देखी गयी.

विपक्षी दलों को नामांकन करने से रोकने के लिए बम और गोलियों का खुल्लम-खुल्ला इस्तेमाल हुआ. लोकसभा चुनाव 2019: भाजपा के बढ़ते प्रभाव और टीएमसी के बचाव के बीच संदेशखाली और भाटपाड़ा जैसे इलाके युद्ध के मैदान बन गये. जय श्रीराम के नारों और राजनीतिक नारों के बीच खूनी संघर्ष की खबरें हर दिन आती रहीं.

इसे भी पढ़ें : बंगाल चुनाव : शीतलकुची के जख्म अब भी हरे, 5 साल बाद भी इंसाफ की आस में रो रहे परिवार 2021: विधानसभा चुनाव के बाद हिंसा (Post-Poll Violence) 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जो हुआ, उसने लोकतंत्र को तार-तार कर दिया. नंदीग्राम, कूचबिहार के शीतलकुची और बीरभूम में हुई घटनाओं ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) तक को दखल देने पर मजबूर कर दिया.

हत्या, आगजनी और विस्थापन की तस्वीरों ने बंगाल की छवि पर गहरा दाग लगाया. WB Election Violence History: बदल गये चेहरे, नहीं बदली ‘चुनावी रणनीति’ बंगाल में चुनावी हिंसा का मुख्य कारण क्षेत्रीय वर्चस्व (Area Domination) की लड़ाई है. उत्तर से लेकर दक्षिण बंगाल के सुदूर गांवों तक, चुनावों के दौरान कच्चे बमों का इस्तेमाल विरोधियों को डराने का सबसे पुराना हथियार रहा है.

चुनाव के बाद होने वाली हिंसा (Post-Poll Violence) बंगाल की एक और दुखद विशेषता है. 2021 के नतीजों के बाद हुई घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं. इसे भी पढ़ें : बंगाल चुनाव के पहले चरण में बवाल, नोदा में पत्थरबाजी-लाठीचार्ज, बीरभूम-कुमारगंज में उम्मीदवारों पर हमला प्रशासन और पुलिस की भूमिका राजनीतिक दलों के बीच होने वाली हिंसा में विपक्षी दलों का हमेशा से आरोप रहा है कि पुलिस की निष्क्रियता या राजनीतिक दबाव के कारण उपद्रवियों के हौसले बुलंद रहते हैं.

सत्ताधारी दल के संरक्षण में अपराधी अपराध को अंजाम देते हैं और उनके खिलाफ पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती. 2026 की चुनौती : क्या इस बार थमेगा खून-खराबा? निर्वाचन आयोग ने हिंसा के इतिहास को देखते हुए इस बार विशेष इंतजाम किये हैं. पहली बार 2 लाख से अधिक सुरक्षाकर्मियों का इंटिग्रेटेड ग्रिड बनाया गया है.

राज्य के हर संवेदनशील बूथ पर केंद्रीय सुरक्षा बलों का पहरा रहेगा. किसी भी गड़बड़ी पर तत्काल कड़ी कार्रवाई होगी. बंगाल की जनता अबकी बार शांतिपूर्ण चुनाव की उम्मीद कर रही है. सवाल है कि क्या 2026 का चुनाव पिछले 20 वर्षों के इस खूनी रिकॉर्ड को तोड़कर एक नयी और अहिंसक मिसाल कायम कर पायेगा? इसे भी पढ़ें बंगाल चुनाव 2026: जंगलमहल में ‘वोटर लिस्ट’ पर शांति, ‘रोटी-बेटी’ पर शोर, जानें क्यों झारग्राम-पुरुलिया में बेअसर SIR का मुद्दा उत्तर बंगाल का ‘किंगमेकर’ कौन? 40 सीटों पर राजबंशी वोटों के लिए TMC और BJP में आर-पार की जंग बंगाल में ‘लाल दुर्ग’ की ढहती दीवारें, 2006 में 233 सीटें और 2021 में ‘शून्य’, 2026 में वामपंथ की वापसी करा पायेगी ‘युवा ब्रिगेड’? ममता बनर्जी बनाम शुभेंदु अधिकारी राउंड-2, नंदीग्राम के बाद भवानीपुर बना जंग का मैदान, दीदी के गढ़ में बदली सियासत.

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