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सिंगूर की ‘नैनो’ कसक : टाटा के जाने के 18 साल बाद खंडहर में भविष्य ढूंढ़ रहे लोग, न खेती बची न उद्योग, पछता रहे आंदोलनकारी

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Prabhat Khabar 25 अप्रैल 2026, 08:47 pm
सिंगूर की ‘नैनो’ कसक : टाटा के जाने के 18 साल बाद खंडहर में भविष्य ढूंढ़ रहे लोग, न खेती बची न उद्योग, पछता रहे आंदोलनकारी

जरूरी बातें बंजर जमीन, कंक्रीट का ढेर और कागजी जीत की हकीकत आजीविका का संकट : महादेव दास युवाओं का गहराता दर्द- हमें गलत बताया गया था Singur Tata Nano Project: सक्रिय कार्यकर्ताओं का पछतावा सियासी समीकरण- क्या बदलेगा जनादेश? 2.42 लाख मतदाताओं का फैसला 29 अप्रैल को Singur Tata Nano Project Ground Report: पश्चिम बंगाल की राजनीति का ‘कुरुक्षेत्र’ कहे जाने वाले सिंगूर में आज भी सन्नाटा है.

वर्ष 2008 में टाटा मोटर्स की नैनो फैक्टरी के यहां से विदा होने के 18 साल बाद भी यह इलाका दोहरी बर्बादी के बीच फंसा हुआ है. जो जमीन कभी सोना उगलती थी, वह अब बंजर कंक्रीट का ढेर है और जिस फैक्टरी ने रोजगार के सपने दिखाये थे, उसके अवशेषों को अब लोग कबाड़ के रूप में बेच रहे हैं.

कभी ममता बनर्जी को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने वाले इस आंदोलन की भूमि पर अब ‘जीत का जश्न’ धीरे-धीरे ‘पछतावे के आंसू’ में बदल गया है. बंजर जमीन, कंक्रीट का ढेर और कागजी जीत की हकीकत वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को जमीन वापस करने का आदेश दिया, लेकिन हकीकत यह है कि वह जमीन अब खेती के लायक नहीं रही.

किसान आशीष बेरा ने बताया कि उन्होंने अपनी तीन बीघा जमीन साफ करने में 1.5 लाख रुपए खर्च किये. फिर भी वहां कुछ नहीं उगता. कंक्रीट और दबे हुए लोहे ने मिट्टी की जान निकाल दी है. आजीविका का संकट : महादेव दास आंदोलन का चेहरा रहे महादेव दास, जिनके पास कभी 12 बीघा जमीन, ट्रैक्टर, पावर टिलर और पंप थे.

मैंने उस जमीन के इर्द-गिर्द अपना पूरा कारोबार खड़ा कर लिया था. अब मेरे पास कुछ नहीं है. आज वह एक छोटी-सी चाय की दुकान चलाने को मजबूर हैं. उनका कहना है कि उन्होंने ऐसी बंजर जमीन के लिए लड़ाई नहीं लड़ी थी. बंगाल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें युवाओं का गहराता दर्द- हमें गलत बताया गया था सिंगूर में सबसे बड़ा बदलाव वहां के लोगों की सोच में आया है.

कल तक उद्योग का विरोध करने वाले हाथ आज काम की तलाश में भटक रहे हैं. नैनो संयंत्र के लिए प्रशिक्षण लेने वाले युवा आज ऐप-आधारित टैक्सी चला रहे हैं या राज्य से बाहर पलायन कर चुके हैं. इसे भी पढ़ें : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद अब ममता बनर्जी भी सिंगूर में कर सकती हैं जनसभा Singur Tata Nano Project: सक्रिय कार्यकर्ताओं का पछतावा पूर्व कार्यकर्ता बिकास दास कहते हैं कि अगर कारखाना रहता, तो आज उनके पास नौकरी होती.

स्नातकोत्तर छात्रा साथी दास का कहना है कि पिता को जमीन तो मिली, लेकिन वह रोजगार नहीं दे पायी. मैंने अपनी तीन बीघा जमीन साफ ​​कराने में ही 1.5 लाख रुपये खर्च कर दिये. इससे पहले हम धान, जूट, आलू और सब्जियां उगाते थे. जमीन उपजाऊ थी. अब उसमें मुश्किल से कुछ उगता है.

आशीष बेरा, किसान सियासी समीकरण- क्या बदलेगा जनादेश? बदहाली के बावजूद सिंगूर तृणमूल कांग्रेस (TMC) का अभेद्य किला बना हुआ है. मंत्री और प्रत्याशी बेचाराम मान्ना का कहना है कि लोगों को याद है कि संकट में ममता बनर्जी उनके साथ खड़ी थीं. सड़कों और सामाजिक योजनाओं का लाभ हर घर तक पहुंचा है.

दूसरी तरफ, भाजपा का आरोप है कि तृणमूल ने सत्ता पाने के लिए सिंगूर का इस्तेमाल किया. फिर उसे लावारिस छोड़ दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में यहां रैली कर उद्योगों को बाहर करने का आरोप लगाया था. इसे भी पढ़ें : बंगाल चुनाव 2026: भितरघात और SIR का घातक कॉकटेल, 120 सीटों पर बिगड़ सकता है दिग्गजों का खेल! 2.42 लाख मतदाताओं का फैसला 29 अप्रैल को सिंगूर निर्वाचन क्षेत्र में ग्रामीण मतदाताओं का दबदबा है.

29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के मतदान में यहां के लोग यह तय करेंगे कि वे ‘सामाजिक योजनाओं’ पर मुहर लगायेंगे या ‘उद्योग और विकास’ की अधूरी चाहत पर. फिलहाल, सिंगूर के खेतों में उगा खर-पतवार और टाटा की फैक्टरी की जंग लगी छड़ें राज्य की राजनीति के एक बड़े बदलाव की गवाह बनी खड़ी हैं.

इसे भी पढ़ें बंगाल के सिंगूर में मोदी करेंगे कई प्रोजेक्ट की शुरुआत, तृणमूल ने लगाये विवादित पोस्टर बंगाल में 2021 जैसी लहर या ‘परिवर्तन’ की आहट? ममता बनर्जी की लोकप्रियता और भाजपा की रणनीति का पूरा विश्लेषण यहां पढ़ें सलीम का दावा- यह नयी और ऊर्जावान माकपा है, 2026 में बंगाल में लाल झंडे की वापसी तय बंगाल चुनाव 2026: नंदीग्राम से दिनहाटा तक वो स्विंग सीटें जो तय करेंगी अगली सरकार चुनाव या ‘बंगाल गॉट टैलेंट’? कोई तल रहा पकौड़े, कोई मांज रहा बर्तन, वोटर को रिझाने के लिए हो रहे क्या-क्या जतन?.

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