पायलट का टेस्ट नॉन-नेगेटिव आए तो क्या होता है? जानें एविएशन में ड्रग टेस्ट के नियम, प्रक्रिया और सजा
एविएशन में पायलट की फिटनेस सिर्फ मेडिकल जांच तक सीमित नहीं होती. उड़ान सुरक्षा को देखते हुए ड्रग टेस्ट भी इस व्यवस्था का अहम हिस्सा है. हाल में एयर इंडिया की फुकेत-दिल्ली फ्लाइट में अचानक करीब 300 फीट की ऊंचाई कम होने की घटना के बाद पायलट का ड्रग टेस्ट किया गया.
जिसकी शुरुआती स्क्रीनिंग रिपोर्ट नॉन-नेगेटिव आई. इसके बाद सैंपल को कंफर्मेटरी जांच के लिए भेजा गया. यहां नॉन-नेगेटिव शब्द को समझना जरूरी है. इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि पायलट ने ड्रग लिया था. शुरुआती स्क्रीनिंग में कुछ दवाओं या दूसरे कारणों से भी ऐसा परिणाम आ सकता है, इसलिए इसका कंफर्मेटरी टेस्ट और मेडिकल रिव्यू किया जाता है.
तो एविएशन में ड्रग टेस्ट कैसे होता है, किन पदार्थों की जांच की जाती है, नॉन-नेगेटिव रिपोर्ट आने के बाद क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है और अगर ड्रग सेवन की पुष्टि हो जाए तो पायलट के खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है? आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं. पहले समझिए ड्रग टेस्ट में नॉन-नेगेटिव रिजल्ट का मतलब ड्रग टेस्ट में सबसे पहले सैंपल की स्क्रीनिंग की जाती है.
इसमें आमतौर पर यूरिन सैंपल की जांच करके देखा जाता है कि उसमें किसी प्रतिबंधित या साइकोएक्टिव पदार्थ के संकेत तो नहीं मिल रहे हैं. अगर शुरुआती जांच में ऐसा कोई संकेत मिलता है तो रिपोर्ट को नॉन-नेगेटिव कहा जाता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति ने ड्रग लिया ही है.
इसे अभी अंतिम नतीजा नहीं माना जाता. ऐसी स्थिति में पायलट को तुरंत उड़ान ड्यूटी से हटा दिया जाता है और दूसरे सैंपल को विस्तृत जांच के लिए लैब भेजा जाता है. इसी जांच को कंफर्मेटरी टेस्ट कहा जाता है. कंफर्मेटरी टेस्ट क्यों जरूरी है? शुरुआती ड्रग स्क्रीनिंग में कभी-कभी फॉल्स पॉजिटिव भी आ सकता है.
आसान भाषा में कहें तो टेस्ट में किसी साइकोएक्टिव पदार्थ के संकेत मिलते हैं, लेकिन हो सकता है कि व्यक्ति ने प्रतिबंधित ड्रग का सेवन नहीं किया हो. कुछ दवाओं के कारण भी शुरुआती टेस्ट प्रभावित हो सकता है. मसलन, कोडीन वाली कुछ दर्द की दवाएं ओपिएट्स के लिए पॉजिटिव संकेत दे सकती है.
इसीलिए सिर्फ शुरुआती स्क्रीनिंग के आधार पर किसी पायलट को ड्रग लेने का दोषी नहीं माना जाता. इसके बाद ज्यादा सटीक तकनीक से कंफर्मेटरी टेस्ट किया जाता है. एविएशन में ड्रग टेस्ट के दौरान किन चीजों की जांच होती है? DGCA के नियमों के तहत विमानन क्षेत्र के सुरक्षा से जुड़े कर्मचारियों के यूरिन सैंपल में छह तरह के साइकोएक्टिव पदार्थों की जांच की जाती है.
एम्फेटामिन और एम्फेटामिन-टाइप स्टिमुलैंट्स ओपिएट्स और उनके मेटाबोलाइट्स कैनाबिस यानी THC कोकीन बर्बिट्यूरेट्स बेंज़ोडायजेपाइन इन पदार्थों का असर किसी व्यक्ति के सोचने, समझने, व्यवहार और शारीरिक क्षमता पर पड़ सकता है. पायलट के मामले में इसका सीधा असर उड़ान की सुरक्षा पर पड़ सकता है.
इसलिए एविएशन में इस तरह की जांच को काफी गंभीरता से लिया जाता है. पायलट का ड्रग टेस्ट कैसे होता है? ड्रग टेस्ट के लिए लिए गए यूरिन सैंपल को दो हिस्सों में बांटकर अलग-अलग कंटेनर में रखा जाता है. पहले सैंपल की तुरंत स्क्रीनिंग की जाती है. अगर इसका रिजल्ट नॉन-नेगेटिव आता है तो पायलट को उड़ान से हटा दिया जाता है.
इसके बाद दूसरे सैंपल को कंफर्मेटरी टेस्ट के लिए तय लैब में भेजा जाता है. वहां ज्यादा सटीक तकनीक से जांच होती है. इसमें GC/MS (Gas Chromatography/Mass Spectrometry) या LC-MS (Liquid Chromatography-Mass Spectrometry) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है.
यही टेस्ट काफी हद तक यह साफ करता है कि शुरुआती स्क्रीनिंग में मिला संकेत वास्तव में किसी प्रतिबंधित पदार्थ की वजह से था या नहीं. अगर कंफर्मेटरी टेस्ट भी पॉजिटिव आ गया तो? कंफर्मेटरी टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद भी सीधे सजा नहीं दी जाती. पहले मेडिकल अधिकारी की ओर से Medical Review Officer यानी MRO की समीक्षा कराई जाती है.
MRO यह देखता है कि पॉजिटिव रिपोर्ट किसी डॉक्टर की सलाह से ली जा रही दवा या किसी वैध मेडिकल ट्रीटमेंट की वजह से तो नहीं आई. अगर समीक्षा के बाद यह साफ हो जाता है कि मामला वास्तव में प्रतिबंधित साइकोएक्टिव पदार्थ के इस्तेमाल का है, तभी DGCA के नियमों के तहत आगे की कार्रवाई होती है.
ये भी पढ़ें: अन्ना के अनशन से JPSC आंदोलन तक, आजादी के बाद भी कायम है गांधी का सत्याग्रह मॉडल ! ड्रग इस्तेमाल की पुष्टि हुई तो क्या होगा? अगर किसी कर्मचारी का ड्रग टेस्ट पॉजिटिव पाया जाता है, तो उसे विशेषज्ञ डॉक्टर, काउंसलर या डी-एडिक्शन सेंटर के जरिए रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम से गुजरना होता है.
इसके बाद ड्यूटी पर वापस आने से पहले उसका दोबारा ड्रग टेस्ट किया जाता है, जिसमे नेगेटिव आना होता है और संगठन के मेडिकल अधिकारी से फिटनेस सर्टिफिकेट भी लेना होगा. हालांकि पहली बार ड्रग टेस्ट पॉजिटिव पाए जाने पर ही यह छूट देते हुए पायलट को सुधार और इलाज पर जोर दिया जाता है.
लेकिन दोबारा ऐसा होने पर कार्रवाई काफी सख्त हो जाती है. अगर पहली बार के बाद ड्यूटी पर लौट चुका कर्मचारी दोबारा ड्रग टेस्ट में पॉजिटिव पाया जाता है तो उसका लाइसेंस तीन साल के लिए निलंबित किया जा सकता है. अगर तीसरी बार भी टेस्ट पॉजिटिव आता है तो उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है.
अगर कोई पायलट टेस्ट कराने से इनकार करता है तो क्या होगा? ड्रग टेस्ट से इनकार करना भी गंभीर मामला माना जाता है. इसके लिए भी DGCA के नियमों में कार्रवाई तय है. पहली बार टेस्ट से इनकार करने पर कर्मचारी को ड्यूटी से हटा दिया जाता है और उसे 48 घंटे के भीतर ड्रग टेस्ट कराना होता है.
अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसका लाइसेंस एक साल के लिए निलंबित किया जा सकता है. साथ ही उसे रिहैबिलिटेशन से भी गुजरना पड़ सकता है. अगर दूसरी बार भी टेस्ट से इनकार किया जाता है, या पहली बार इनकार करने के बाद अगला टेस्ट पॉजिटिव आता है, तो लाइसेंस तीन साल के लिए निलंबित किया जा सकता है.
इसके बाद फिर नियमों का उल्लंघन होने पर लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान है. क्या आम दवाओं के इस्तेमाल से भी ड्रग टेस्ट में दिक्कत आ सकती है? हां, ऐसा संभव है. कुछ सामान्य दवाओं में मौजूद तत्व शुरुआती ड्रग स्क्रीनिंग में नॉन-नेगेटिव रिजल्ट दे सकते हैं. इसी वजह से पायलटों को बिना डॉक्टर या संगठन के मेडिकल अधिकारी की सलाह के दवा लेने से बचने की सलाह दी जाती है.
पायलटों के संगठन Airline Pilots’ Association of India (ALPA India) ने भी अपने सदस्यों को इस बारे में सावधान किया है. संगठन के मुताबिक सर्दी-जुकाम, खांसी, एलर्जी और नींद के लिए बाजार में मिलने वाली कुछ ओवर-द-काउंटर दवाओं में ऐसे तत्व हो सकते हैं, जो ड्रग स्क्रीनिंग को प्रभावित कर सकते हैं.
इसलिए पायलटों को कोई नई दवा शुरू करने से पहले मेडिकल अधिकारी से सलाह लेने, अपनी दवाओं की जानकारी सही-सही देने और प्रिस्क्रिप्शन व मेडिकल स्टोर की रसीद संभालकर रखने की सलाह दी गई है. ये भी पढ़ें: क्यों हो रही बिहार में शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश? समझिए पूरा हिसाब-किताब क्या पायलट का रैंडम ड्रग टेस्ट भी किया जाता है DGCA ने विमानन कर्मचारियों के ड्रग टेस्ट से जुड़े नियम सितंबर 2021 में जारी किए थे.
ये नियम 31 जनवरी 2022 से लागू हुए. इन नियमों के तहत पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर जैसे सुरक्षा से जुड़े कर्मचारियों में हर साल कम से कम 10 फीसदी का रैंडम ड्रग टेस्ट किया जाना जरूरी है. इसके अलावा किसी सुरक्षा से जुड़ी घटना के बाद भी ड्रग टेस्ट कराया जा सकता है.
एयर इंडिया की फुकेत-दिल्ली फ्लाइट के मामले में भी घटना के बाद पायलट की जांच इसी वजह से की गई. ये नियम सिर्फ पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर तक सीमित नहीं हैं. विमान के रखरखाव से जुड़े इंजीनियर और सर्टिफाइंग स्टाफ, ट्रेनी पायलट, इंस्ट्रक्टर और एग्जामिनर जैसे दूसरे सुरक्षा-संवेदनशील कर्मचारियों का भी टेस्ट किया जाता है.
फुकेत-दिल्ली फ्लाइट मामले में अभी तक क्या जानकारी सामने आई है इस मामले में पायलट की शुरुआती ड्रग स्क्रीनिंग नॉन-नेगेटिव आई थी. लेकिन इस रिपोर्ट को ड्रग सेवन की अंतिम पुष्टि नहीं माना जाता. इसके लिए कंफर्मेटरी टेस्ट और उसके बाद मेडिकल समीक्षा की प्रक्रिया होती है.
फ्लाइट में अचानक करीब 300 फीट की ऊंचाई कम होने की घटना की जांच Aircraft Accident Investigation Bureau (AAIB) कर रहा है. शुरुआत में घटना को गंभीर टर्बुलेंस से जोड़कर देखा गया था. इसके अलावा, विमान के हाइड्रोलिक और कंट्रोल सिस्टम में संभावित गड़बड़ी के पहलू की भी जांच की जा रही है.
इस घटना में 17 यात्री और क्रू सदस्य घायल हुए थे. इसलिए पायलट का नॉन-नेगेटिव ड्रग टेस्ट हादसे की जांच का सिर्फ एक पहलू है. इससे अकेले यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि घटना की वजह ड्रग का इस्तेमाल था. हादसे की पूरी तस्वीर सामने आने के लिए विमान की तकनीकी स्थिति, उड़ान के दौरान की परिस्थितियों, क्रू की भूमिका और जांच में सामने आने वाले दूसरे सबूतों को भी देखा जाएगा.
एविएशन में ड्रग टेस्ट क्यों जरूरी है एविएशन में ड्रग टेस्ट का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि पायलट और दूसरे सुरक्षा-संवेदनशील पदों पर काम करने वाले कर्मचारी किसी ऐसे पदार्थ के प्रभाव में न हों, जिससे उनकी सोचने-समझने और फैसला लेने की क्षमता प्रभावित हो.
इसीलिए नियमों में सिर्फ एक शुरुआती स्क्रीनिंग पर भरोसा नहीं किया जाता. पहले स्क्रीनिंग होती है, फिर जरूरत पड़ने पर कंफर्मेटरी टेस्ट और उसके बाद मेडिकल रिव्यू किया जाता है. इसलिए किसी पायलट की शुरुआती रिपोर्ट नॉन-नेगेटिव आना गंभीर जरूर है, लेकिन यह अपने आप में ड्रग सेवन का अंतिम सबूत नहीं है.
अंतिम तस्वीर कंफर्मेटरी टेस्ट और मेडिकल समीक्षा के बाद ही साफ होती है. पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर.