सरकारी स्कूल का जायजा लेने से पहले क्यों जरूरी है परमिशन ? CJP विवाद से समझिए पूरा नियम
जयपुर के बगरू के रामपुरा-कंवरपुरा गांव में सरकारी स्कूल का जायजा लेने पहुंची CJP की टीम और ग्रामीणों के बीच विवाद हो गया. CJP का आरोप है कि उसके साथ मारपीट और पथराव हुआ, गाड़ियों के शीशे तोड़े गए और कार्यकर्ताओं को चोट आई. वहीं, दूसरी तरफ गांव के लोगों का कहना है कि बाहर से आए लोग स्कूल सुधारने नहीं, बल्कि राजनीति करने पहुंचे थे.
हालांकि, पुलिस का कहना है कि मारपीट नहीं हुई, सिर्फ धक्कामुक्की हुई. लेकिन मामला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. यहां सवाल ये उठता है कि क्या कोई भी बाहरी व्यक्ति सरकारी स्कूल में जाकर उसकी हालत देख सकता है? अगर नहीं, तो स्कूल में जाने के लिए किसकी परमिशन जरूरी है? CJP की टीम रामपुरा-कंवरपुरा क्यों गई थी? CJP यानी कॉकरोच जनता पार्टी इन दिनों स्कूल ठीक करो अभियान चला रही है.
संगठन का कहना है कि वह सरकारी स्कूलों की हालत देख रहा है और वहां मौजूद समस्याओं को सामने ला रहा है. इसी अभियान के तहत टीम 21 अगस्त को रामपुरा-कंवरपुरा के सरकारी स्कूल पहुंची थी. टीम स्कूल की बिल्डिंग, बच्चों के बैठने की व्यवस्था, टॉयलेट, पानी और दूसरी सुविधाओं को देखना चाहती थी.
लेकिन गांव में पहुंचने के बाद टीम का विरोध शुरू हो गया. CJP ने आरोप लगाया कि उसके लोगों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की गई, पथराव हुआ और गाड़ियों के शीशे तोड़े गए. दूसरी तरफ ग्रामीणों का कहना है कि CJP के लोग बाहर से आए थे और स्कूल के नाम पर राजनीति कर रहे थे.
मामले को लेकर पुलिस ने क्या कहा? पुलिस का शुरुआती बयान CJP और ग्रामीणों के दावों से अलग है. शिवदासपुरा थाना पुलिस के मुताबिक मौके पर मारपीट नहीं हुई, बल्कि दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की हुई. पुलिस ने स्थिति को संभालने की कोशिश की और उस समय तक किसी पक्ष की शिकायत मिलने की बात भी सामने नहीं आई थी.
इसलिए इस मामले में फिलहाल, CJP का आरोप, ग्रामीणों का पक्ष और पुलिस का शुरुआती बयान में तीन अलग-अलग बातें सामने हैं. इसलिए जब तक एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट, वीडियो या दूसरे सबूत सामने नहीं आते, तब तक किसी एक पक्ष की बात को अंतिम सच मानना ठीक नहीं होगा. हालांकि, यहां सवाल दूसरा है.
असल मामला ये है कि क्या कोई बाहरी व्यक्ति सरकारी स्कूल में जाकर उसकी हालत देख सकता है? इसे समझने के लिए राजस्थान शिक्षा विभाग द्वारा जारी 16 अगस्त के आदेश को समझना होगा, जो अभी चर्चा में है. राजस्थान शिक्षा विभाग के 16 अगस्त के आदेश में क्या है? राजस्थान शिक्षा विभाग द्वारा 16 अगस्त को जारी आदेश में स्कूल में प्रवेश को लेकर नियम बताए गए है.
आदेश में बाहर से आने वाले लोगों के प्रवेश के लिए प्रधान यानी स्कूल के प्रचार्य की अनुमति लेनी होगी. स्कूल में आने वाले व्यक्ति का डिटेल्स विजिटर रजिस्टर में लिखा जाएगा. इसके अलावा स्कूल में फोटो, वीडियो, ऑडियो रिकॉर्डिंग, इंटरव्यू या लाइव स्ट्रीमिंग जैसी गतिविधियों के लिए भी पूर्व लिखित अनुमति की बात कही गई है.
विभाग द्वारा इसका मकसद बच्चों की सुरक्षा और उनकी निजता की रक्षा करना बताया गया है. तो क्या कोई भी स्कूल में जांच के लिए नहीं जा सकता? हालांकि ,इन नियमों में मीडिया को सरकारी स्कूलों में पूरी तरह जाने से रोकने के अलावा कुछ छुट दी गई थी. शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कहा है कि मीडिया पर पूरी तरह रोक नहीं है.
लेकिन स्कूल में बच्चे होते हैं और उनकी फोटो, वीडियो या बातचीत रिकॉर्ड करने से पहले अनुमति की जरूरत है. यानी सरकारी स्कूल होने का मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी समय स्कूल में जाकर वीडियो बना सकता है या लाइव कर सकता है. फिर स्कूल की खराब हालत का पता कैसे चलेगा ? मान लीजिए किसी सरकारी स्कूल में टॉयलेट खराब है.
बच्चों के लिए पानी नहीं है. बिल्डिंग की हालत खराब है या बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ रहे हैं. ऐसी स्थिति में कोई व्यक्ति सीधे स्कूल में जाकर वीडियो बनाने लगे, ऐसा जरूरी नहीं है. उसे पहले स्कूल प्रशासन या संबंधित शिक्षा अधिकारी से अनुमति लेनी चाहिए. अगर शिकायत करनी है तो संस्था प्रधान, शिक्षा विभाग के अधिकारियों और जिला स्तर के अधिकारियों के सामने मामला रखा जा सकता है.
अभिभावक और स्कूल प्रबंधन समिति भी स्कूल की समस्याओं को उठा सकते हैं. जरूरत पड़ने पर सरकारी काम और खर्च से जुड़ी जानकारी सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के जरिए भी मांगी जा सकती है. सरकारी स्कूल में जाने और उसकी निगरानी करने में है अंतर यह बात समझना जरूरी है कि किसी सामाजिक संगठन या नागरिक को सिर्फ इसलिए स्कूल में जाकर जांच करने का अधिकार नहीं मिल जाता क्योंकि वह सरकारी स्कूल है.
स्कूल परिसर में बच्चों की सुरक्षा और निजता को देखते हुए बाहरी लोगों के प्रवेश के लिए अनुमति की व्यवस्था हो सकती है. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि कोई नागरिक या संगठन स्कूल की समस्याओं पर सवाल ही नहीं उठा सकता. अगर किसी को लगता है कि स्कूल में टॉयलेट नहीं है, पीने का पानी नहीं है, भवन खराब है या बच्चों को जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, तो वह पहले स्कूल प्रशासन या संबंधित शिक्षा अधिकारी के सामने अपनी शिकायत रख सकता है.
जरूरत पड़ने पर जिला शिक्षा विभाग तक मामला पहुंचाया जा सकता है. अगर कोई संगठन स्कूल की स्थिति का मौके पर जाकर जायजा लेना चाहता है, तो उसके लिए अनुमति की प्रक्रिया साफ होनी चाहिए. किस अधिकारी से अनुमति लेनी है, कितने समय में जवाब मिलेगा और किन शर्तों के साथ स्कूल में प्रवेश दिया जाएगा, यह जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए.
यानी स्कूल के अंदर जाकर जांच करने का अधिकार और स्कूल की व्यवस्था पर सवाल पूछने का अधिकार एक ही बात नहीं है. प्रवेश के लिए नियम हो सकते हैं, लेकिन शिकायत और जानकारी पाने का रास्ता भी उतना ही आसान होना चाहिए. बच्चों की सुरक्षा भी जरूरी, जवाबदेही भी सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे, खासकर नाबालिग, स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी होते हैं.
इसलिए किसी बाहरी व्यक्ति को बिना अनुमति स्कूल में आने देना, बच्चों की फोटो-वीडियो बनाना या उनकी बातचीत रिकॉर्ड करना सुरक्षा और निजता से जुड़े सवाल खड़े कर सकता है. इसी वजह से प्रवेश और रिकॉर्डिंग के लिए अनुमति की व्यवस्था जरूरी हो सकती है. लेकिन दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों की पारदर्शिता और जवाबदेही भी जरूरी है.
इसलिए सवाल यह है कि बच्चों की सुरक्षा और निजता के साथ-साथ सरकारी स्कूलों की निगरानी और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाए. पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर.