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खाद के लिए डिजिटल जंग! ई-टोकन व्यवस्था बनी किसानों की नई मुसीबत, घंटों कतारों में पसीना बहा रहा अन्नदाता

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Mukesh Rathor 03 जून 2026, 12:06 pm
खाद के लिए डिजिटल जंग! ई-टोकन व्यवस्था बनी किसानों की नई मुसीबत, घंटों कतारों में पसीना बहा रहा अन्नदाता
**सिंगोली। किसानों की सुविधा और खाद वितरण में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा शुरू की गई ई-टोकन प्रणाली जमीनी स्तर पर किसानों के लिए राहत के बजाय परेशानी का सबब बनती नजर आ रही है। खरीफ एवं रबी सीजन की तैयारियों के बीच यूरिया और डीएपी खाद की बढ़ती मांग तथा ई-टोकन जनरेट करने में आ रही तकनीकी बाधाओं ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। स्थिति यह है कि भीषण गर्मी में किसान सुबह से ही खाद केंद्रों के बाहर लंबी कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं। सर्वर डाउन और तकनीकी खामियों ने बढ़ाई परेशानी प्रशासन का दावा था कि ई-टोकन व्यवस्था से किसानों को घर बैठे या नजदीकी कियोस्क के माध्यम से टोकन प्राप्त हो जाएगा और लंबी लाइनों से छुटकारा मिलेगा। लेकिन वास्तविकता इससे उलट दिखाई दे रही है। किसानों के अनुसार एग्री स्टैक और ई-विकास जैसे पोर्टलों पर अत्यधिक लोड के कारण सर्वर बार-बार डाउन हो रहा है। मोबाइल पर ओटीपी समय पर नहीं पहुंचने से घंटों इंतजार करना पड़ता है। वहीं प्रतिदिन सीमित संख्या में स्लॉट उपलब्ध होने से बड़ी संख्या में किसान बिना टोकन के ही वापस लौट रहे हैं। बुजुर्ग और महिला किसानों पर सबसे ज्यादा असर डिजिटल व्यवस्था का सबसे अधिक प्रभाव बुजुर्ग, महिला एवं तकनीकी जानकारी से वंचित किसानों पर पड़ रहा है। संयुक्त खाताधारकों, नामांतरण लंबित परिवारों तथा आधार सत्यापन संबंधी समस्याओं के कारण अनेक किसानों को खाद प्राप्त करने में अतिरिक्त परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल की तैनाती तक करनी पड़ रही है। एक किसान ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, "मोबाइल पर टोकन बुक ही नहीं होता और जब केंद्र पर पहुंचते हैं तो बताया जाता है कि ऑनलाइन स्लॉट फुल हो चुके हैं। समय पर खाद नहीं मिली तो फसल प्रभावित हो जाएगी।" किसान संगठनों ने की सुधार की मांग हालांकि प्रशासन का कहना है कि ई-टोकन प्रणाली से कालाबाजारी और बिचौलियों पर अंकुश लगेगा, लेकिन किसानों और किसान संगठनों का कहना है कि व्यवस्था में तत्काल सुधार किया जाए। संयुक्त किसान मोर्चा सहित विभिन्न किसान संगठनों ने मांग की है कि ऑनलाइन प्रणाली के साथ-साथ ऑफलाइन या सरल वैकल्पिक व्यवस्था भी जारी रखी जाए, ताकि किसानों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।**
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