राजनीतिक विद्वेष और महिला आरक्षण विधेयक, पढ़ें विक्रम उपाध्याय का लेख
लेखक : विक्रम उपाध्याय महिला आरक्षण बिल अभी पास नहीं हुआ, लेकिन महिलाओं की आपसी प्रतिद्वंद्विता या पद प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा ने इसके मूल उद्देश्य को ही फीका कर दिया है. एक तो महिलाओं को वैसे ही प्रतिनिधित्व कम प्राप्त है, उससे भी कम उन्हें नेतृत्व करने का अवसर प्राप्त है और जिन्हें प्राप्त है उन्हें भी नीचे खीचने का प्रयास यदि महिलाएं ही करें तो फिर महिला आरक्षण का लाभ कहां प्राप्त होगा? महाराष्ट्र के मामले में यह खास कर देखा जा जा रहा है जहां लगातार उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के काम काज पर सवाल उठाया जा रहा हैं.
पारिवारिक झगड़े को सतह पर लाया जा रहा है. अब सुनेत्रा पवार के लोग ही कह रहे हैं कि एक महिला होकर भी एक और महिला का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. अजित पवार की आकस्मिक मौत के कारण सुनेत्रा पवार को महाराष्ट्र का उपमुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन इसके बाद भी सुप्रिया सुले ने उपमुख्यमंत्री के रूप में उनका स्वागत नहीं किया.
अब लगातार शरद पवार गुट की ओर से उपमुख्यमंत्री के काम काज पर सवाल खड़ा किया जा रहा है. महिला आरक्षण का प्रमुख उद्देश्य महिलाओं की न सिर्फ राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देना, बल्कि उनमें संभावित राजनीतिक नेतृत्व के गुणों को भी उभार कर समाज में उसको मान्यता देना भी है.
महिला आधिकारिता और महिला आरक्षण, ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं. एनसीपी ( अजित पवार) के लोग कह रहे हैं कि सुप्रिया सुले दिखावे के लिए महिला आरक्षण बिल के समर्थन कर रही हैं. सुनेत्रा पवार को जब से अपने नेतृत्व क्षमता को साबित करने का अवसर मिला है, तभी से येन केन प्रकारेण उनकी छवि खराब करने की कोशिश की जा रही है.
कांग्रेस और एनसीपी (पवार) के नेता लगातार सुनेत्रा पवार के खिलाफ प्रचार और विरोध में लिप्त दिखाई दे रहे हैं. नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण बिल) विधेयक का उद्देश्य स्पष्ट है. सरकार इसके जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीधे चुने जाने वाले सभी प्रीतिनिधियों की संख्या कम से कम 33 प्रतिशत करना चाहती है.
यानि कुल सीटों में से 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना चाहती है. यदि ऐसा हो जाता तो इससे न केवल भारत के राजनीतिक परिदृश्य में महिलाओं की बड़ी भागीदारी सुनिश्चित हो जाती, बल्कि समाज के नजरिए में भी एक बड़ा बदलाव आता. 21 वीं सदी की महिलायें देश के विकास से जुड़े सभी निर्णयों में शामिल होती और वे स्वयं इसमें बड़ा योगदान करतीं.
लेकिन विपक्ष के अड़ियल रवैये और नारी जाति के विकास में बाधा डालने की उनकी सोंच ने इस विधेयक को पास होने नहीं दिया. सिर्फ़ कानून बनाने से राजनीतिक संस्कृति नहीं बदल जाती. जब तक राजनीतिक दलों में इस बात की चेतना नहीं जगती कि महिलाएं दशकों से अपने संवैधानिक अधिकार के लिए लड़ रही हैं, उनको समाज में आगे लाने के अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व की जरूरत है, तब तक कोई बदलाव नहीं आ सकता.
किसी भी राजनीतिक दल को महिला का सम्मान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. कहने को तो महिला आरक्षण अधिनियम का समर्थन कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा भी कर रही हैं एनसीपी (पवार) की नेता सुप्रिया सुले भी इस अधिनियम को जल्द लागू करने की मांग कर रही हैं, लेकिन जब बात इस पर अमल की आती है तो इसे टालने के बहाने भी इन्हीं की तरफ से आ जाते हैं। इसका उदाहरण सामने है.
सुनेत्रा पवार को महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री नियुक्त किया गया, यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी. प्रतीकात्मक ही सही लेकिन महाराष्ट्र के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है. महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले की धरती से सुधार आंदोलनों की एक शृंखला रही है.
राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री की नियुक्ति का महत्व भी इसी सुधार के साथ देखा जाना चाहिए था, क्योंकि छह दशकों से अधिक समय से चली आ रही एक संस्थागत बाधा को तोड़ कर राज्य में एक महिला को सत्ता के शीर्ष पर बिठाया गया था. सुनेत्रा पवार ने भी दिखाया कि आगे बढ़कर वह नेतृत्व कर सकती हैं.
उनकों समर्थन और समय देने के बजाय विपक्ष सार्वजनिक रूप से इस बात की चर्चा में लग गया है कि वह नेतृत्व करने में सक्षम हैं कि नहीं, जबकि उन्हें खुद को साबित करने के लिए पर्याप्त समय भी नहीं मिला है. सरकार के काम काज की जांच-परख होनी ही चाहिए. मंत्रियों से भी सवाल-जवाब होने चाहिए.
लेकिन कामकाज के मूल्यांकन के बहाने किसी महिला नेता को ही राजनीतिक लड़ाई का मुख्य निशाना नहीं बनाना चाहिए. इससे तो महिलाओं का सशक्तिकरण और उनका राजनीतिक उठान पर ही सवाल खड़ा हो जाएगा. इतनी कटु आलोचना इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वे दूसरे गुट से हैं. उन्हें इस आधार पर अयोग्य ठहराने की कोशिश का प्रतिकार किया जाना चाहिए.
इसी रवैये को हम महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रति प्रतिबद्धता में कमी और सिद्धांतों के विपरीत ठहरा सकते हैं. आने वाले वर्षों में भारत में और भी महिलाएं विधानसभाओं और संसद में जाएंगी. कुछ मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री और शायद प्रधानमंत्री भी बनेंगी. उनसे असहमति भी होगी, लेकिन उन्हें यह बार-बार यह साबित करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि वे उन पदों पर बैठने की हक़दार हैं.
क्योंकि वे महिलाएं हैं. अगर हम मानते हैं कि महिलाएँ सत्ता की राजनीतिक में ज़्यादा हिस्सेदारी की हक़दार हैं, तो उन्हें एक बेहतर शासक के रूप में हमें स्वीकार भी करना पड़ेगा. महिला के प्रति सम्मान ऐच्छिक नहीं हो सकता है. महिला आरक्षण अधिनियम की तार्किक परिणिती भी यही है.
महिलाओं का सशक्तिकरण मतदान केंद्र से शुरू होकर शपथ ग्रहण समारोह पर खत्म नहीं हो सकता. अफसोस की बात तो यह है कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान प्रियंका गांधी ने 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' का नारा दिया था, अब वही कांग्रेस की नेता विपक्ष में होने के कारण महिला नेत्रियों पर ही चुनिंदा रूप से लगातार व्यक्तिगत हमले कर रही हैं.
कांग्रेस लगातार एनसीपी की नेता सुनेत्रा के खिलाफ नकारात्मक खबरें फैलाने में लगी है. यह दर्शाता है कि महिला सशक्तिकरण के प्रति कांग्रेस की कितनी प्रतिबद्धता है। इस समय डीएमके और एन सी पी ( शरद पवार) के भी बीजेपी के करीब आने की खबरें चल रही हैं. क्या सिर्फ इस लिए सुनेत्रा पवार पर तो हमले नहीं किये जा रहे हैं कि उनकी जगह कोई और लेने का मंसूबा बना रहा है.
अगर ऐसा है तो महिला सशक्तिकरण के लिए इन पार्टियों की कोई प्रतिबद्धता नहीं है..