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आसमान से चेतावनी, जमीन से जवाब… कैसे काम करता है अमेरिकी सुरक्षा नेटवर्क, जानिए पूरी कहानी

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Prabhat Khabar 23 मार्च 2026, 11:50 am
आसमान से चेतावनी, जमीन से जवाब… कैसे काम करता है अमेरिकी सुरक्षा नेटवर्क, जानिए पूरी कहानी

US Security Network Air Defense: ईरान युद्ध में मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण खाड़ी के अरब देशों के महत्वपूर्ण ढांचे पर असर पड़ रहा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी ईरान ने बंद कर दिया है, इससे वैश्विक तेल की कीमतें लगातार तेजी से बढ़ रही हैं. पश्चिम एशिया के इस युद्ध में अरबों डॉलर की अमेरिकी रडार प्रणाली भी ईरान के हमलों का निशाना बनी हैं और नष्ट हुई हैं, जिससे अमेरिका की रक्षा क्षमता पर असर पड़ा है.

ईरान के आसपास अमेरिका की सैन्य मौजूदगी में दर्जनों ठिकाने और हजारों सैनिक शामिल हैं, जो खतरे में हो सकते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर ईरान से कोई मिसाइल अमेरिकी सैन्य अड्डे की ओर दागी जाती है, तो सैनिकों को समय रहते इसकी जानकारी कैसे मिलती है? अमेरिका और उसके सहयोगियों ने एक बहुस्तरीय प्रणाली विकसित की है, जो दिन-रात आसमान पर नजर रखती है.

इस प्रणाली में अंतरिक्ष में उपग्रह, जमीन पर रडार, समुद्र में तैनात युद्धपोत और हवा में उड़ान भरने वाले विमान शामिल हैं. इसके साथ ही अमेरिकी अंतरिक्ष कमान के प्रशिक्षित सैन्य अधिकारी इनसे मिले डेटा के आधार पर तुरंत फैसले लेते हैं. अमेरिकी वायु सेना के पूर्व अधिकारी और अब मिसिसिपी विश्वविद्यालय में एयरोस्पेस और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के प्रोफेसर के रूप में मैंने उन विशाल गठबंधनों और प्रणालियों के नेटवर्क का अध्ययन किया है जो इसे संभव बनाते हैं.

मिसाइल का पता लगाने का सबसे तेज तरीका अंतरिक्ष से निगरानी है. अमेरिका के उन्नत उपग्रह, जैसे अंतरिक्ष आधारित इंफ्रारेड प्रणाली, पृथ्वी के ऊपर से लगातार निगरानी करते हैं. मिसाइल रक्षा के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले ये अरबों डॉलर के उपग्रह, मिसाइल प्रक्षेपण से निकलने वाली तीव्र गर्मी को लगभग तुरंत ही पहचान सकते हैं.

जब कोई मिसाइल दागी जाती है, तो उससे निकलने वाली तेज गर्मी अंतरिक्ष से भी दिखाई देती है. उपग्रह अपने इंफ्रारेड सेंसर से इस गर्मी को पहचान लेते हैं और कुछ ही सेकंड में चेतावनी भेज दी जाती है. यह शुरुआती चेतावनी बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इससे जमीन या समुद्र पर मौजूद सेना को तैयारी का समय मिल जाता है.

यह संकेत बाद में जमीन पर मौजूद ‘ज्वाइंट टैक्टिकल ग्राउंड स्टेशन’ तक पहुंचता है, जहां से इसे पूरे रक्षा नेटवर्क में तेजी से साझा किया जाता है. रडार से मिसाइल की पूरी उड़ान पर नजर उपग्रह सिर्फ शुरुआत में मदद करते हैं, इसके बाद जमीन आधारित रडार मिसाइल पर नजर रखते हैं.

मिसाइल छोड़े जाने के बाद जमीन पर स्थित रडार शुरुआती उपग्रह संकेत के बाद स्थिति संभालते हैं. रडार रेडियो तरंगें भेजते हैं, जो किसी वस्तु (जैसे मिसाइल) से टकराकर वापस आती हैं. इससे पता चलता है कि मिसाइल कहां है और किस दिशा में जा रही है. अमेरिका छोटी और लंबी दोनों दूरी के रडार का इस्तेमाल करता है: लंबी दूरी का रडार (एन/एफपीएस-132) लगभग 4,800 किमी दूर तक देख सकता है.

एक अन्य अहम रडार एनएन/टीपीवाई-2 करीब 3,200 किमी की दूरी तक अधिक सटीक जानकारी देता है. टीपीवाई-2 रडार आमतौर पर मिसाइल को मार गिराने वाले हथियारों के पास ही लगाए जाते हैं, ताकि जानकारी तुरंत इस्तेमाल हो सके. कुल मिलाकर उपग्रह मिसाइल के प्रक्षेपण को पकड़ते हैं और रडार उसकी पूरी उड़ान पर नजर रखते हैं.

हालांकि, ईरानी बलों ने हाल ही में जॉर्डन और कतर में तैनात इन महत्वपूर्ण रडार प्रणालियों को निशाना बनाया. ये प्रणालियां बहुत महंगी हैं और इन्हें जल्दी बदलना आसान नहीं है. इसके कारण अमेरिका को एक अतिरिक्त टीपीवाई-2 मिसाइल को कोरिया से हटाकर पश्चिम एशिया में तैनात करना पड़ा है.

हालांकि, इससे अमेरिकी निगरानी प्रणाली कमजोर जरूर हुई है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. अमेरिका के पास अन्य रडार भी हैं, जैसे ब्रिटेन में मौजूद प्रणाली, जो मदद कर सकते हैं. अमेरिकी नौसेना के जहाजों पर एजिस कॉम्बैट सिस्टम (एएन/एसपीवाई-1 रडार) लगे होते हैं, जो करीब 322 किलोमीटर तक निगरानी कर सकते हैं.

जहाज जरूरत के हिसाब से खतरे वाले क्षेत्रों के पास जा सकते हैं. ये भी पढ़ें:- जल्द समाप्त नहीं होगा ईरान युद्ध! ट्रंप के वित्त मंत्री बोले- US के पास इसके लिए बहुत पैसा है ये भी पढ़ें:- ईरान युद्ध में फंस चुका है US… ‘लादेन के शिकारी’ पूर्व CIA चीफ ने ट्रंप को ठहराया जिम्मेदार, दी ये सलाह ड्रोन पकड़ना क्यों मुश्किल है? ईरान से आ रही मिसाइलों की तुलना में ड्रोन को पकड़ना और नष्ट करना ज्यादा कठिन साबित हो रहा है.

इसका कारण यह है कि मिसाइलें तेज और ज्यादा गर्म होती हैं, इसलिए आसानी से पकड़ी जाती हैं. शाहिद प्रणाली जैसे ईरान के ड्रोन अलग हैं. वे कम गर्मी छोड़ते हैं, जिससे इंफ्रारेड सेंसर उन्हें जल्दी से पकड़ नहीं पाते हैं. कई ड्रोन छोटे होते हैं और जमीन के पास उड़ते हैं जिससे उन्हें रडार पर देख पाना मुश्किल होता है.

कुछ फाइबर या प्लास्टिक से बने होते हैं, जो रडार में कम दिखते हैं. कई ड्रोन जीपीएस प्रणाली से चलते हैं और रेडियो सिग्नल नहीं छोड़ते. इससे उनकी पहचान और उन पर नजर रखना कठिन हो जाता है. कई तकनीकों का संयुक्त उपयोग ड्रोन से निपटने के लिए एक ही तकनीक काफी नहीं है.

अमेरिका कई तरीकों का एक साथ इस्तेमाल करता है. इसके अलावा, नयी तकनीकों पर भी काम चल रहा है, जैसे: ध्वनि सेंसर, जो ड्रोन की आवाज से उन्हें पहचान सकते हैं. अमेरिका और उसके सहयोगी लगातार अपनी रक्षा प्रणाली को मजबूत कर रहे हैं. उदाहरण के लिए अमेरिका यूक्रेन से ध्वनिक सेंसर खरीदने के लिए बातचीत कर रहा है, जो ड्रोन के आने की आवाज सुन सकते हैं, भले ही उन्हें अन्य तरीकों से देखा न जा सके.

नए सेंसर, बेहतर सॉफ्टवेयर और तेज संचार से रक्षा व्यवस्था को मज़बूत बनाने में मदद मिलेगी. लक्ष्य साफ है: खतरों का जल्द पता लगाना, तेजी से प्रतिक्रिया देना और लक्ष्य को तेजी से भेदना. पीटीआई-भाषा के इनपुट साथ..

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