जावद में महिलाओं ने ईशर-गणगौर की पूजा की, गेहूं और चने की 'घुघरी' का भोग लगाया, गोर-गोर गोमती, ईसर पूजे पार्वती गाया
जावद, सिंगोली, रतनगढ़ और सरवानिया समेत पूरे अंचल में गणगौर तीज का पर्व उत्साह के साथ मनाया गया। सुहाग और सौभाग्य के इस पर्व पर चारों ओर लोक संस्कृति की छटा बिखरी नजर आई।
पर्व के अवसर पर महिलाएं और नवयुवतियां पारंपरिक राजस्थानी और मध्य प्रदेशी वेशभूषा में सजी-धजी नजर आईं। हाथों में रची मेहंदी और पारंपरिक आभूषणों ने उत्सव के रंग को और भी गहरा कर दिया।
महिलाओं ने ईशर-गणगौर की प्रतिमाओं का विधि-विधान से पूजन कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना की।
पूजन के दौरान गणगौर माता और ईशर जी का आकर्षक श्रृंगार किया गया। इस अवसर पर विशेष रूप से गेहूं और चने की 'घुघरी' का भोग लगाया गया। घरों और मोहल्लों में मंगल गीतों की गूंज रही और पारंपरिक बनोरे निकाले गए।
सवारी और मेला
क्षेत्र के विभिन्न गांवों और शहरों में गाजे-बाजे के साथ गणगौर की सवारी निकाली गई। यह सवारी प्रमुख मार्गों से होती हुई ठाकुर जी मंदिर पहुंची, जहां विसर्जन और समापन की प्रक्रिया पूरी हुई। मंदिर परिसरों में मेलों का भी आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़े।
सांस्कृतिक जीवंतता का प्रतीक
स्थानीय निवासी ज्योति ममता ने बताया कि यह पर्व मां पार्वती और भगवान शिव की आराधना का प्रतीक है, जिनसे अमर सुहाग और निरोगता का आशीर्वाद मांगा जाता है। आयोजन के दौरान स्थानीय प्रशासन भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर मुस्तैद रहा। गणगौर तीज ने एक बार फिर क्षेत्र की प्राचीन परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया।
महिलाओं ने भजन गाये
गोर-गोर गोमती, ईसर पूजे पार्वती। पार्वती का आला-गीला, गौर का सोना का टीका।
टीका दे टमका दे रानी, व्रत करियो गौरा दे रानी। करता-करता आस आयो, मास आयो।
खेरे-खाण्डे लाड़ू ल्यायो, लाड़ू ले वीरा ने दियो। वीरो ले मने चूनड़ दीनी, चूनड़ ले मने सुहाग दियो।
शीतल पाटी सों को कतको, गूंजा-लडू पेड़ा। ईसर जी काला, गौरा दे गोरी।
राजा की बेटी, रानी की जाई। दूध-पूत से सदा अघाई।