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योगी vs शाह: क्या BJP की ‘सक्सेशन पॉलिटिक्स’ में सबसे बड़ा चेहरा योगी हैं? 4 पॉइंट में समझिए

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Prabhat Khabar 02 सितंबर 2026, 08:47 am
योगी vs शाह: क्या BJP की ‘सक्सेशन पॉलिटिक्स’ में सबसे बड़ा चेहरा योगी हैं? 4 पॉइंट में समझिए

बीजेपी में नरेंद्र मोदी के बाद नेतृत्व को लेकर अक्सर योगी आदित्यनाथ और अमित शाह के नामों की चर्चा होती है. लेकिन राजनीतिक ऑप्टिक्स में योगी की ताकत सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं, बल्कि हिंदुत्व, जनाधार और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान का ऐसा कॉम्बिनेशन है, जो उन्हें बाकी नेताओं से अलग करता है.

योगी को हटाना सिर्फ CM बदलना नहीं, यूपी का राजनीतिक समीकरण बदलना होगा योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत सिर्फ यह नहीं है कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. उनके पास तीन अलग-अलग तरह की Political Capital दिखाई देती है- धार्मिक वैधता, चुनावी विश्वसनीयता और स्वतंत्र हिंदुत्व की पहचान.

गोरखनाथ पीठ के महंत के तौर पर उनकी अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान है. इसके अलावा गोरखपुर से लंबे समय तक सांसद रहने का चुनावी अनुभव और 2017 के बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता में उनका लगातार बने रहना उन्हें बीजेपी के भीतर एक अलग कद देता है. यही वजह है कि योगी को किसी सामान्य मुख्यमंत्री की तरह देखना राजनीतिक रूप से अधूरा होगा.

उनका मॉडल सीधे Mass Politics से जुड़ता है- हिंदुत्व की स्पष्ट भाषा, कानून-व्यवस्था पर सख्त छवि और ‘बुलडोजर मॉडल’ की राजनीतिक ब्रांडिंग. Political optics में संदेश साफ है: योगी की कुर्सी पर सवाल सिर्फ लखनऊ का सवाल नहीं बनता, बल्कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सामाजिक और राजनीतिक आधार से भी जुड़ जाता है.

CM योगी आदित्यनाथ 2. योगी की सबसे बड़ी USP: ‘Modi के बाद कौन?’ का जवाब नहीं, अपनी अलग पहचान भारतीय राजनीति में किसी नेता की ताकत का एक पैमाना यह भी होता है कि क्या उसकी पहचान किसी दूसरे बड़े नेता की छाया से बाहर निकल चुकी है. योगी आदित्यनाथ के मामले में यही सबसे दिलचस्प पहलू है.

वह नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री बनकर नहीं आए. उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, गोरखनाथ पीठ और हिंदुत्व की राजनीति से बनाई. 2017 के बाद से उनकी राजनीतिक पहचान लगातार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही है. 2019 के लोकसभा चुनाव और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी की रणनीति में उनकी भूमिका को लेकर लगातार राजनीतिक बहस होती रही.

2022 में बीजेपी के सत्ता में दोबारा लौटने के बाद योगी ने उत्तर प्रदेश में लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाया. यानी योगी की राजनीतिक पूंजी का एक हिस्सा organizational appointment से नहीं, बल्कि mass electoral legitimacy से आता है. यही चीज उन्हें बीजेपी की भविष्य की राजनीति में अलग तरह का चेहरा बनाती है.

उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान पर मेरी किताब पढ़ें 3. अमित शाह की ताकत अलग है: योगी के पास Mass Appeal, शाह के पास Political Machinery यही वह जगह है जहां Yogi Adityanath vs Amit Shah की राजनीतिक बहस सबसे दिलचस्प हो जाती है. अमित शाह की ताकत मुख्य रूप से संगठन, चुनावी रणनीति और सत्ता के राजनीतिक प्रबंधन से जुड़ी रही है.

बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की बड़ी जीत के दौरान उनकी भूमिका ने उन्हें देश के सबसे प्रभावशाली चुनावी रणनीतिकारों में स्थापित किया. 2019 के बाद गृह मंत्री के तौर पर भी शाह ने केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और वैचारिक एजेंडों को आगे बढ़ाया.

इसलिए दोनों की राजनीतिक शैली को एक लाइन में समझें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है- योगी = Mass Appeal + Hindutva + Electoral Base शाह = Organization + Strategy + Political Management यही अंतर बताता है कि दोनों को सिर्फ ‘कौन ज्यादा ताकतवर है’ के सवाल से देखना शायद सही नहीं होगा.

असल सवाल यह है कि बीजेपी को भविष्य में किस तरह की नेतृत्व शैली की जरूरत होगी? केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह. योगी के खिलाफ नैरेटिव भी उनकी ताकत का संकेत क्यों बन जाता है? राजनीतिक ऑप्टिक्स में किसी नेता के बारे में चल रही चर्चाएं कभी-कभी उसके प्रभाव का संकेत भी बन जाती हैं.

पिछले कुछ वर्षों में समय-समय पर योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की अटकलें सामने आती रही हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी ऐसी चर्चाओं का राजनीतिक इस्तेमाल देखने को मिला. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है. अटकल और वास्तविक राजनीतिक निर्णय एक चीज नहीं हैं.

फिर भी, इन चर्चाओं का लगातार मौजूद रहना यह बताता है कि योगी अब सिर्फ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखे जाते. उनकी राष्ट्रीय राजनीतिक क्षमता पर भी बहस होती है. यही कारण है कि योगी को हटाने की किसी भी चर्चा का राजनीतिक असर सामान्य नेतृत्व परिवर्तन से बड़ा हो सकता है.

खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां बीजेपी की राष्ट्रीय चुनावी ताकत का बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है. Political optics में योगी की ताकत का सबसे बड़ा संकेत शायद यही है- उनके भविष्य की चर्चा अब सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं रहती. Read more: हेमंत सोरेन नहीं आए, कांग्रेस छा गई! झारखंड की Tribal Politics में क्या होने वाला है? Bottom Line योगी आदित्यनाथ को अमित शाह का प्रतिद्वंद्वी मानना अभी एक राजनीतिक नैरेटिव है, स्थापित तथ्य नहीं.

लेकिन राजनीतिक ऑप्टिक्स में योगी की बढ़ती अहमियत को नजरअंदाज करना भी मुश्किल है. उनकी असली ताकत दिल्ली की संगठनात्मक मशीनरी नहीं, बल्कि लखनऊ से लेकर गोरखपुर तक बना उनका अपना राजनीतिक-सामाजिक आधार है. इसलिए भविष्य की बीजेपी की कहानी को सिर्फ 'Yogi vs Shah' के रूप में पढ़ना शायद जल्दबाजी होगी.

असल कहानी शायद यह है कि नरेंद्र मोदी के बाद बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा कैसा होगा- एक Mass Leader, एक संगठनात्मक रणनीतिकार या कई ताकतवर नेताओं का Collective Model?.

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