पश्चिम बंगाल ने ममता बनर्जी को दिल से निकाला... जन्म-कर्म भूमि भवानीपुर में कैसे हार गईं दीदी?
Why Mamata Banerjee Lost Bhawanipur: कोलकाता की गलियों में 4 मई 2026 का दिन पश्चिम बंगाल की सियासत का फिल्मी क्लाइमैक्स रहा. यहां सत्ता, साख और सस्पेंस तीनों साथ चल रहे थे. मुख्य किरदार रहीं ममता बनर्जी. एक ऐसी नायिका, जिसने 34 साल के लेफ्ट के शासन को संघर्ष और धरने से खत्म किया, जिन्हें बंगाल ने प्यार से ‘दीदी’ पुकारा.
लेकिन सियासत का तकाजा हावी हुआ और बंगाल की यह संघर्षशील दीदी हार चुकी हैं. हद यह कि 2011 से बंगाल की शीर्ष नेता और तीन बार की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने घर भवानीपुर में हार गईं. भवानीपुर… वो जगह, जहां कभी दीदी के हर कदम पर तालियां गूंजती थीं. वह इलाका, जहां कालीघाट की गलियों में उनका घर है, जहां से उनकी राजनीति ने उड़ान भरी थी.
दीदी ने अपने राजनीतिक संघर्ष के दौरान धरना दिया, सिर फुड़वाया, सिंगूर से टाटा को रुखसत किया, मां-माटी-मानुष, बंगाली भद्रलोक को अपनी ओर किया, बंगाल का इतिहास, उसकी अस्मिता… और वो सबकुछ किया, जिसकी बदौलत वह बंगाल की शीर्ष नेता बनीं. लेकिन इस बार माहौल बदल गया, बिल्कुल ऐसे, जैसे किसी जानी-पहचानी कहानी में अचानक नया मोड़ आ जाए.
इस मोड़ पर थे शुभेंदु अधिकारी. वही शुभेंदु दा, जो कभी दीदी के सबसे भरोसेमंद साथी रहे, अब दूसरी तरफ थे. सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के रूप में. वर्ष 2026 का यह मुकाबला सिर्फ चुनाव नहीं था, यह रिश्तों के टूटने और सियासत के बदलते रंगों की कहानी भी रही. 4 मई दीदी गई… कैसे? 4 मई की सुबह 8 बजे ‘गेरुआ’ आसमान के नीचे मतगणना शुरू हुई.
शुरुआत में पोस्टल बैलेट ने अधिकारी को बढ़त दिलाई. फिर दीदी ने वापसी की. सातवें राउंड तक वो आगे निकल गईं. उम्मीद की फुसफुसाहट थी कि दीदी संभाल लेंगी… एक वक्त ऐसा भी आया जब उनकी बढ़त 19 हजार पार कर गई. जैसे जीत बस कुछ कदम दूर हो. लेकिन कहानी ने फिर करवट ली.
शाम ढलते-ढलते बढ़त सिकुड़कर कुछ हजार रह गई. रात गहराई और स्क्रीन पर आंकड़े उलटने लगे. 16वें राउंड में शुभेंदु अधिकारी 563 वोट से आगे हुए. 18 राउंड के बाद तस्वीर और साफ हो गई. अधिकारी आगे… आगे… और बहुत आगे निकल गए. अब उनका मुड़कर देखने का कोई इरादा नहीं था.
अंतिम दृश्य में, नतीजा आया. शुभेंदु अधिकारी करीब 15 हजार 105 वोटों से जीत गए. अधिकारी को 73,917 वोट मिले, वहीं ममता बनर्जी को 58,812. भवानीपुर, जो कभी दीदी का किला था, अब उनके लिए ढह चुका था. भवानीपुर में ममता बनर्जी की हार की क्या वजहें रहीं? भवानीपुर की आबादी खुद एक किरदार है.
बंगाली, गैर-बंगाली, मुस्लिम, प्रवासी. हर किसी की अपनी सोच, अपना झुकाव. इस बार समीकरण बदले. कुछ बंगाली हिंदू वोटर, जो पहले दीदी के साथ थे, उन्होंने रुख बदला. हिंदीभाषी व्यापारी वर्ग भी एकजुट दिखा. महिलाओं ने ममता बनर्जी को ‘त्याग’ दिया. शब्द कठोर लग सकता है, लेकिन जमीन पर यह साफ दिखा.
महिलाओं ने ममता बनर्जी को किसी भी कीमत पर हराने की ठान ली थी. इस हार के पीछे कई वजहें थीं. ममता बनर्जी की हार के क्या-क्या सबप्लॉट्स रहे. इसकी तह और परत खुल रही है. एक्सपर्ट्स ने एक-एक कर सब गिनाई हैं. ये भी पढ़ें:- सयानी घोष का गाना बना TMC की हार का कारण? उमा भारती का तंज ये भी पढ़ें:- विधायक बनीं दूसरे के घर झाड़ू-पोछा-बर्तन करने वाली कलिता माझी, BJP ने बंगाल में किया गजब परिवर्तन महिलाओं की नाराजगी एक बड़ा कारण इंडियन एक्सप्रेस की वंदिता मिश्रा ने बीबीसी के एक कार्यक्रम में बताया कि महिला मतदाताओं का रुख इस बार अलग था.
उनका कहना था कि ममता सरकार ने योजनाओं के जरिए आर्थिक मदद जरूर दी, लेकिन रोजगार देने में नाकाम रहीं. इसके अलावा महिलाओं ने स्थानीय स्तर पर टीएमसी नेटवर्क में गुंडागर्दी, ‘कट मनी’, व्यापार में दखल और केंद्र की योजनाओं का लाभ न मिलने जैसी शिकायतें भी उठाईं.
ऊपर से ममता बनर्जी का बयान- महिलाओं को 8 बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए. महिला सुरक्षा भी बड़ा चुनावी मुद्दा चुनाव के दौरान महिला सुरक्षा एक अहम मुद्दा बन गया था. कई महिलाएं खुलकर कह रही थीं कि बीजेपी के सत्ता में आने से सुरक्षा बेहतर हो सकती है.
अगस्त 2024 में आरजी कर हॉस्पिटल में महिला डॉक्टर के साथ रेप और हत्या की घटना, उससे पहले संदेशखाली मुद्दा और राज्य में महिलाओं के खिलाफ अन्य अपराधों ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया. आरजी कर केस में मृत पीड़ित की मां को तो बीजेपी ने चुनाव में उतारा और उम्मीदवार ने करीब 28 हजार वोटों से जीत हासिल की.
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का भी अहम रोल फिर आया एक और मोड़ SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन. हजारों नाम वोटर लिस्ट से हटे. तृणमूल कांग्रेस ने इसे अपने कोर वोटर्स पर चोट बताया, जबकि इलेक्शन कमीशन ने इसे प्रक्रिया का हिस्सा कहा. लेकिन जमीन पर इसका असर दिखा.
खामोशी से, मगर गहराई से. लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हट गए. विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में वोटरों का हटना चुनावी समीकरण पर असर डाल गया. यह भी पहली बार हुआ कि राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या पिछले चुनाव के मुकाबले कम रही. हालांकि मतदान प्रतिशत करीब 92% तक पहुंच गया, जो 2021 से भी ज्यादा था.
ये भी पढ़ें:- सरकार कैसे बनेगी? तमिलनाडु में विजय की TVK के पास हैं ये ऑप्शन ये भी पढ़ें:- TVK की चली आंधी, तमिलनाडु में केवल एक वोट से हार गया ये दिग्गज एंटी-इनकम्बेंसी भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण के आरोप बीबीसी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी ने कहा कि इस चुनाव में ममता बनर्जी के सामने सत्ता विरोधी लहर एक बड़ी चुनौती थी.
कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी, घोटाले और विकास से जुड़े सवाल लगातार उठते रहे. मुस्लिम तुष्टिकरण और घुसपैठ जैसे मुद्दों को चुनाव में प्रमुखता से उठाया गया. इससे बहुसंख्यक वोटरों के बीच एक खास नैरेटिव बना, जिसका फायदा बीजेपी को मिला. पिछले कुछ सालों में टीएमसी पर पीडीएस, कैटल स्मगलिंग और शिक्षक भर्ती घोटाला के लगे भ्रष्टाचार के आरोप भी ममता के खिलाफ माहौल बनाने में अहम रहे.
शहरी इलाकों, खासकर कोलकाता में, सरकार के खिलाफ नाराज़गी बढ़ी. बीजेपी की मजबूत रणनीति जहां बीजेपी ने ममता बनर्जी को मुद्दों से घेरा. वहीं उसने चुनाव में संगठनात्मक स्तर पर बेहतर काम किया. बूथ स्तर तक तैयारी की गई और चुनाव को आक्रामक तरीके से लड़ा गया.
बीजेपी ने इस सीट को सिर्फ चुनाव नहीं, प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया. उसने अपने सबसे मजबूत चेहरे को उतारा. शुभेंदु अधिकारी. वही चेहरा जिसने 2021 में भी दीदी को नंदीग्राम में हराया था. बंगाल चुनाव के ‘रणनीतिकार’ गृहमंत्री अमित शाह की महीनों की रणनीति, सटीक प्लानिंग और वोटों का ध्रुवीकरण.
सब कुछ बने बनाए प्लान की तरह आगे बढ़ा. दीदी का चुनाव प्रचार, अभियान फेल हुआ उधर दीदी का प्रचार ऐसा, जैसे पुराने हिट फॉर्मूले की रीमेक. महिलाओं को लुभाने वाली ‘लक्ष्मी भंडार’ और ‘युवा साथी’ जैसी वेलफेयर योजनाएं, भावनात्मक अपील, घर की बेटी का रिश्ता, सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए डीए बकाया देने की घोषणा भी की गई.
धरना की कोशिश. अपने भ्रष्टाचार को छुपाने की कोशिश. लेकिन इस बार दर्शक बदल चुके थे. आक्रामक दीदी इस बार, कई बार हाथ जोड़े भी नजर आईं. यह बंगाल की जनता ने नहीं देखा था. और फिर वो दृश्य. एक रैली, एक मंच, और अचानक दीदी का भाषण बीच में रुक जाना. उन्होंने कहा कि अगर हो सके तो मुझे वोट देना… और मंच छोड़कर चली गईं.
यह पल किसी फिल्म के उस सीन जैसा था, जहां हीरो खुद अपनी कहानी के अंत को महसूस करने लगता है. ये भी पढ़ें:- केरल से ही वामपंथी सत्ता का हुआ था सूर्योदय, वहीं से हुआ सूर्यास्त ये भी पढ़ें:- ऑपरेशन सिंदूर की बरसी से पहले भारत ने जारी किया NOTAM, बंगाल की खाड़ी में होगा यह मिसाइल टेस्ट विजयी नायक शुभेंदु अधिकारी दीदी को हराने के बाद क्या बोले? भवानीपुर में जीत दर्ज करने के बाद, माथे पर लाल तिलक लगाए शुभेंदु अधिकारी टीवी स्क्रीन पर नजर आए.
हाथ में था इलेक्शन कमीशन का प्रमाण पत्र. जीत के बाद उनके बयान ने पूरे चुनाव का क्रिस्प और शॉर्ट उत्तर दिया. सवाल था- ममता बनर्जी क्यों हारीं? शुभेंदु बोले- ममता बनर्जी का हारना बेहद जरूरी था. वार्ड नंबर 77 में मुस्लिम मतदाताओं ने बड़ी संख्या में ममता बनर्जी को समर्थन दिया.
लेकिन अधिकारी को हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय के लोगों ने जीत दिलाई. अधिकारी ने कहा कि यह परिणाम ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा के अंत की तरह है. शुभेंदु दा ने पहले ही कहा था कि ममता को वह अंतिम राउंड में हराएंगे. जीत का मार्जिन 17,000 होगा. कमोवेश हुआ भी वही.
उनकी भविष्यवाणी से एक बात जरूर साफ हुई, वोटर के मन और एक-एक वोट की गिनती को भाजपा ने जोड़ा था. बंगाल के सियासत का क्लाइमैक्स सेट था. बस यह उसी तरह उतारा गया..