1998 में आंदोलन की कोख से जन्म, सत्ता का घमंड और ऐतिहासिक पतन, पढ़ें ममता बनर्जी की पार्टी TMC की पूरी कहानी
खास बातें आंदोलन के दम पर ढाह दिया वामपंथ का किला बंगाल की मसीहा बनीं दीदी, 15 साल तक किया शासन अचानक नहीं मची टीएमसी में तबाही भड़क उठी सालों से सुलग रही विद्रोह की चिंगारी पार्टी में मचे गदर के 2 प्रमुख कारण 58 विधायकों की बगावत की वजह और क्रोनोलॉजी संघर्ष के दम पर बंगाल की मसीहा बनीं थीं दीदी कॉर्पोरेट कल्चर ने फिर सड़क पर ला दिया TMC Rise and Fall History: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त जो भूचाल आया हुआ है, वह महज एक चुनावी हार की वजह से नहीं है.
इसके पीछे एक बड़ी कहानी है. 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने जिस तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बुनियाद रखी थी, वह आज अपने वजूद के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. 58 बागी विधायकों ने दीदी से पार्टी का सिंबल छीनकर खुद को ‘असली तृणमूल’ साबित कर दिया है.
ममता बनर्जी के साम्राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया है. आंदोलन के दम पर ढाह दिया वामपंथ का किला इसके साथ ही राजनीति के गलियारों में टीएमसी के उत्थान और पतन की चर्चा तेज हो गयी. कभी सड़कों पर लाठियां खाकर, सिंगूर और नंदीग्राम के किसान आंदोलनों के दम पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढाह देने वाली पार्टी आखिर कैसे इस कगार पर पहुंच गयी, इसकी पूरी इनसाइड क्रोनोलॉजी बंगाली जनमानस को हैरान करने वाली है.
बंगाल की मसीहा बनीं दीदी, 15 साल तक किया शासन दीदी कैसे बंगाल की मसीहा बन गयीं. 15 साल तक राज्य की सत्ता की बागडोर संभालने वाली पार्टी टीएमसी महज 15 दिन में कैसे ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी, उसकी पूरी इनसाइड स्टोरी बतायेंगे. इससे पहले बताते हैं कि पार्टी के बिखरने की शुरुआत कब से और कैसे हुई.
इसे भी पढ़ें : कालीघाट की बैठकों के ‘सीक्रेट दस्तावेज’ लीक, रीतब्रत ने पूछे 3 सवाल, सीआईडी खंगालेगी विधायकों का मोबाइल लोकेशन अचानक नहीं मची टीएमसी में तबाही टीएमसी की राजनीतिक तबाही अचानक नहीं हुई. बहुत ही सुनियोजित तरीके से इसे अंजाम दिया गया. चुनावी नतीजों के तुरंत बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और उत्तराधिकार (Succession) को लेकर सवाल उठने लगे थे.
पहली ही सांगठनिक बैठक में विधायकों ने राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और उनके कॉर्पोरेट सलाहकारों (I-PAC) पर हार का ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया. बंगाल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें भड़क उठी सालों से सुलग रही विद्रोह की चिंगारी दूसरे हफ्ते में ममता बनर्जी ने सांगठनिक नियंत्रण वापस पाने के लिए राज्य की सभी कमेटियों को भंग करने और बागियों पर सीआईडी (CID) जांच का दांव चला, तो विद्रोह की चिंगारी, जो टीएमसी में सालों से सुलग रही थी, भड़क गयी.
विधायकों ने एकजुट होकर रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में सीधे विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को अपना अलग समर्थन पत्र सौंप दिया और तृणमूल कांग्रेस पर भी दावा ठोंक दिया. पार्टी में मचे गदर के 2 प्रमुख कारण पार्टी के भीतर मचे गदर के 2 सबसे बड़े कारण हैं, जिसकी वजह से विधायकों के सब्र का बांध टूट गया.
पहला अभिषेक बनर्जी के सम्मान में खड़े होकर ताली बजाने की परंपरा और दूसरा शोभनदेव चट्टोपाध्याय को लीडर ऑफ ऑपोजीशन बनाने के लिए स्पीकर को लिखी गयी चिट्ठी पर फर्जी हस्ताक्षर. इसे भी पढ़ें : टूट गयी तृणमूल कांग्रेस, रीतब्रत 58 बागी विधायकों के समर्थन से बने विपक्ष के नेता, बोले- ममता मंजूर, अभिषेक नहीं 58 विधायकों की बगावत की वजह और क्रोनोलॉजी टीएमसी की आंतरिक बैठकों में नेताओं के लिए फरमान जारी किया गया कि जब भी अभिषेक बनर्जी बैठक में आयेंगे, तो उनके लिए स्टैंडिंग ओवेशन (खड़े होकर ताली बजाने) देना है, पार्टी के सीनियर लीडर्स को यह बात नागवार गुजरी.
विवाद तब और बढ़ गया, जब शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने वाले पत्र में कई विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर होने की बात सामने आयी. इसके बाद ममता बनर्जी खेमे ने एफआईआर और सीआईडी जांच की धमकी दी, जिसने बागियों को आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया.
बागी खेमे में 17 मुस्लिम विधायकों का शामिल होना और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम का इस्तीफा यह दिखाता है कि ममता बनर्जी का अपनी पार्टी के अल्पसंख्यक कोर वोट बैंक और वफादारों पर से नियंत्रण अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है. सत्ता बदलते ही ममता बनर्जी की रैलियों में ग्लैमर का तड़का लगाने वाली ‘टॉलीवुड ब्रिगेड’ ने भी कालीघाट से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया.
इस तरह जो पार्टी कभी जनता की आवाज बनकर उभरी थी, आज वह अपनी आंतरिक तानाशाही और अहंकार की वजह से इतिहास के सबसे गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है. संघर्ष के दम पर बंगाल की मसीहा बनीं थीं दीदी 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस के भीतर मूकदर्शक बने रहने की बजाय बगावत का झंडा बुलंद किया और तृणमूल कांग्रेस का गठन किया.
शुरुआती दिनों में यह सिर्फ एक क्षेत्रीय आंदोलन था, जिसका मकसद पश्चिम बंगाल को वाम मोर्चा (Left Front) के शासन से मुक्ति दिलाना था. 2006 से 2008 के बीच सिंगूर में टाटा के नैनो प्रोजेक्ट के खिलाफ भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन और नंदीग्राम में किसानों पर हुई पुलिस फायरिंग ने ममता बनर्जी को सूबे की राजनीति का केंद्र बिंदु बना दिया.
‘मां, माटी, मानुष’ के नारे ने बंगाल के गरीब किसानों, मजदूरों और मध्यवर्ग को दीदी का दीवाना बना दिया. 2011 में ऐतिहासिक बहुमत के साथ टीएमसी सत्ता के शिखर पर पहुंच गयी. TMC Rise and Fall History: कॉर्पोरेट कल्चर ने फिर सड़क पर ला दिया राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि टीएमसी के इस अभूतपूर्व पतन की पटकथा उसी दिन लिख दी गयी थी, जब पार्टी ने अपने बुनियादी सांगठनिक चरित्र को बदल दिया.
सत्ता में आने के बाद धीरे-धीरे पार्टी की कमान ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के हाथों में जाने लगी. पुराने और अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर आई-पैक (I-PAC) जैसी डेटा-ड्रिवेन कॉर्पोरेट कंसल्टेंसी एजेंसियों को टिकट वितरण और सांगठनिक फैसलों का जिम्मा सौंप दिया गया.
जो नेता सिंगूर और नंदीग्राम में पुलिस की लाठियां खाकर पार्टी को सत्ता में लाये थे, उन्हें कंप्यूटर के सर्वे और डिजिटल रेटिंग के आधार पर रबर स्टैंप बना दिया गया. बंगाल चुनाव 2026 में पार्टी को मिली करारी हार के बाद विधायकों-सांसदों ने लीडरशिप को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें चुप कराने की कोशिश की.
लोकतंत्र की बात करने वाली पार्टी की तानाशाही ने उसे अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया. इसे भी पढ़ें अधीर रंजन चौधरी का बड़ा बयान- अपनी ही करनी का फल भुगत रही हैं टीएमसी चीफ ममता बनर्जी ममता बनर्जी का कोलकाता की सड़कों पर चटाई बिछाकर धरना, टीएमसी में टूट की आशंका के बीच ‘दिल्ली चलो’ का नारा बंगाल में महाराष्ट्र जैसे विभाजन के दावों पर भड़के शोभनदेव चट्टोपाध्याय, कहा- ममता बनर्जी के पास ही रहेगा ‘जोड़ा फूल’ मैं भी बड़ी खिलाड़ी हूं, समय आने पर दूंगी जवाब, चौतरफा संकट के बीच फेसबुक लाइव पर गरजीं ममता बनर्जी.