CBSE थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूले पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब, पूछा- 'क्या स्कूलों में 23 भाषाएं पढ़ाने की क्षमता है'
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के स्कूलों में त्रि-भाषा फॉर्मूला (Three-Language Formula) लागू करने के नियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस मामले पर याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील जी. प्रियदर्शिनी ने अदालत की कार्यवाही की जानकारी देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस व्यवस्था को जमीन पर उतारने के तौर-तरीकों को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे हैं और विस्तृत स्पष्टीकरण की मांग की है.
'23 भाषाओं का विकल्प तो दिया, पर क्या पढ़ाने की विशेषज्ञता है?' अधिवक्ता जी. प्रियदर्शिनी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि तकनीकी रूप से नियमों में छात्रों को 23 भाषाओं में से चयन करने का विकल्प दिया गया है, लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या हमारे पास सभी स्कूलों में इतनी भाषाओं को पढ़ाने की विशेषज्ञता और जरूरी शिक्षक उपलब्ध हैं? उन्होंने कहा कि सिर्फ विकल्प दे देने से समस्या हल नहीं होती, बल्कि स्कूलों में इसे लागू करने के लिए बुनियादी ढांचे और योग्य अध्यापकों की उपलब्धता सबसे जरूरी है.
अंग्रेजी को विदेशी भाषा मानने पर मांगा स्पष्टीकरण वकील ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सबसे अहम सवाल अंग्रेजी भाषा के दर्जे को लेकर पूछा है. सरकारी दस्तावेजों में अंग्रेजी को एक 'विदेशी भाषा' (Foreign Language) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है.
इस पर अदालत ने सरकार से रुख साफ करने को कहा है कि क्या अंग्रेजी को आधिकारिक तौर पर विदेशी भाषा माना जाएगा या स्थानीय/देशीय भाषा, क्योंकि इसके बिना व्यवस्था में बड़ा भ्रम पैदा हो सकता है. किस कक्षा से लागू होगी तीसरी भाषा और पुराने छात्रों का क्या? इसके अलावा अदालत ने सरकार से दो अन्य प्रमुख बिंदुओं पर भी जवाब मांगा है.
पहला यह कि त्रि-भाषा फॉर्मूले के तहत तीसरी भाषा को किस कक्षा (स्टैंडर्ड) से अनिवार्य रूप से लागू किया जाएगा. वहीं, दूसरा सवाल उन छात्रों के भविष्य को लेकर है जो वर्तमान में पहले से ही कोई तीसरी भाषा पढ़ रहे हैं. अदालत ने पूछा है कि नए नियम लागू होने के बाद मौजूदा छात्रों की पढ़ाई और उनके सिलेबस पर क्या असर पड़ेगा.
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