10 साल का इंतजार, फिर IVF से मिली जुड़वा बेटियां और हत्या का आरोप, क्या पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक मां को इतना तोड़ सकता है?
बेंगलुरु में तीन महीने की जुड़वा बच्चियों की मौत का मामला सामने आया है. जिसमें उनके मां पर आरोप है कि उसने पानी में डुबोकर दोनों को मार दिया. डॉक्टरों ने भी महिला को पोस्टपार्टम डिप्रेशन में होने की आशंका जताई है. अब इस घटना ने प्रसव के बाद कुछ महिलाओं में मानसिक सेहत पर पड़ने वाले गंभीर असर पर सवाल खड़े कर दिया है.
क्या होता है पोस्टपार्टम डिप्रेशन? यह प्रसव के बाद होने वाली एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, जो कुछ महिलाओं में विकसित होती है. जिसमें महिला लंबे समय तक उदासी, चिंता, चिड़चिड़ापन, थकान या बच्चे से जुड़ाव में कठिनाई महसूस कर सकती है. यह सामान्य “बेबी ब्लूज” (आम लक्षण) से अधिक गंभीर होता है.
लेकिन जरूरत पड़ने पर इसका इलाज संभव है. पोस्टपार्टम डिप्रेशन में मां बच्चे की जान ले सकती है? मनोचिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पोस्टपार्टम डिप्रेशन प्रसव के बाद होने वाली एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या हो सकती है, इसके गंभीर रूप में महिला को अत्यधिक निराशा, चिंता, अपराधबोध, बच्चे से जुड़ाव में परेशानी या खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आ सकते हैं.
बहुत दुर्लभ मामलों में पोस्टपार्टम साइकोसिस जैसी स्थिति भी हो सकती है, जिसमें भ्रम और वास्तविकता से संपर्क टूटने के कारण मां या बच्चे की सुरक्षा को खतरा हो सकता है. हालांकि, पोस्टपार्टम डिप्रेशन से पीड़ित अधिकांश महिलाएं अपने बच्चे को नुकसान नहीं पहुंचातीं और सही समय पर इलाज, परिवार के सहयोग और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद से ठीक हो सकती हैं.
भारत में समस्या कितनी बड़ी है? भारत में पोस्टपार्टम डिप्रेशन को लेकर उपलब्ध शोध भी चिंता की तस्वीर पेश करता है. 2017 में Bulletin of the World Health Organization में प्रकाशित Ravi Prakash Upadhyay और उनके सहयोगियों के systematic review और meta-analysis में 38 अध्ययनों और 20,043 महिलाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया.
शोध में भारत में पोस्टपार्टम डिप्रेशन की pooled prevalence 22% (95% CI: 19–25%) पाई गई, यानी औसतन करीब हर पांच में से एक महिला प्रसव के बाद पोस्टपार्टम डिप्रेशन से प्रभावित थी. हालांकि, इन आंकड़ों का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि पोस्टपार्टम डिप्रेशन से पीड़ित मां अपने बच्चे को नुकसान पहुंचाएगी.
अधिकांश महिलाएं ऐसा नहीं करतीं. बच्चे को नुकसान पहुंचाने जैसी बेहद गंभीर घटनाओं में विशेष रूप से यह देखना जरूरी होता है कि कहीं पोस्टपार्टम साइकोसिस, गंभीर अवसाद, बाइपोलर डिसऑर्डर या कोई दूसरी मानसिक अवस्था तो मौजूद नहीं थी. ये भी पढ़ें: बेंगलुरु: महिला पर अपनी 3 माह की जुड़वां बेटियों को पानी में डुबोकर हत्या का आरोप, फिर खुदकुशी की कोशिश, केस दर्ज IVF और लंबे इंतजार का भावनात्मक दबाव भी घटना का एक पहलू हो सकता है करीब 10 साल इंतजार के बाद IVF से महिला को जुड़वा बच्चे हुए थे.
जिससे IVF के बाद गर्भधारण और मातृत्व अपने साथ मानसिक दबाव भी ला सकता है. लंबे समय तक बांझपन का इलाज, गर्भावस्था को लेकर चिंता, प्रसव, नींद की कमी, नवजात बच्चों की लगातार देखभाल और परिवार की अपेक्षाएं, ये सभी प्रसव के बाद मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालने वाले कारक हो सकते हैं.
भारत में हुए शोध में आर्थिक परेशानी, वैवाहिक तनाव, परिवार या पति का पर्याप्त सहयोग न मिलना और पहले से मानसिक बीमारी का इतिहास जैसे कई कारकों को पोस्टपार्टम डिप्रेशन से जोड़ा गया है. प्रसव के बाद मां की मानसिक सेहत की जांच क्यों जरूरी है? बेंगलुरु की यह घटना सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि मातृत्व के उस अनदेखे पक्ष की ओर भी ध्यान खींचती है जहां एक महिला से बच्चे के जन्म के बाद तुरंत खुश, मजबूत और सक्षम रहने की उम्मीद की जाती है, जबकि कुछ मामलों में उसे उसी समय सबसे ज्यादा मानसिक सहारे और चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत होती है.
ये भी पढ़ें: बलिया में दाह संस्कार की तैयारी कर रहे थे परिजन, अचानक उठ बैठा 70 साल का बुजुर्ग, फिर जो हुआ... अगर किसी नई मां में लगातार निराशा, अत्यधिक बेचैनी, नींद न आना, बच्चे से जुड़ाव महसूस न होना, असामान्य व्यवहार, भ्रम, आवाजें सुनाई देना या खुद/बच्चे को नुकसान पहुंचाने की बात सामने आए, तो इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.
यह तत्काल मानसिक स्वास्थ्य सहायता की जरूरत का संकेत हो सकता है. इस मामले में अभी क्या पता है? फिलहाल पुलिस की जांच का निष्कर्ष सामने नहीं आया है कि महिला किसी मानसिक बीमारी या पोस्टपार्टम डिप्रेशन से पीड़ित थी. इसलिए बच्चियों की मौत को “डिप्रेशन की वजह से हुई हत्या” कहना अभी उचित नहीं होगा..