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सैटेलाइट डेटा में खुलासा: गंगा के मैदानों का धुआं हिमालय तक पहुंचा; बिहार-बंगाल सबसे बड़े हॉटस्पॉट

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Prabhat Khabar 26 मई 2026, 10:03 pm
सैटेलाइट डेटा में खुलासा: गंगा के मैदानों का धुआं हिमालय तक पहुंचा; बिहार-बंगाल सबसे बड़े हॉटस्पॉट

Air Pollution: विशेषज्ञों के अनुसार, अब NCAP 2.0 में ग्रामीण स्तर पर हस्तक्षेप की तत्काल जरूरत है. यह अध्ययन कोलकाता के बोस संस्थान के प्रो अभिजीत चटर्जी के निर्देशन में किया गया, जिसमें सौमेन रौल मुख्य शोध सहयोगी रहे. एटमॉस्फेरिक एनवायरनमेंट पत्रिका में प्रकाशित यह शोध तीन दशकों में प्रदूषण स्तर, उसके स्रोतों और हॉटस्पॉट्स में आए बदलावों का एक व्यापक दीर्घकालिक आकलन है.

इसके लिए सैटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग आंकड़ों का उपयोग किया गया है, जिसे जमीनी स्तर के अवलोकनों से भी सत्यापित किया गया है. एक दशक में 20% से अधिक बढ़ा प्रदूषण सैटेलाइट आधारित इस अध्ययन में इंडो-गैंगेटिक प्लेन, हिमालयी क्षेत्र और पूर्वोत्तर भारत के 25 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया.

इसमें पाया गया कि साल 2000–2009 की तुलना में, 2010–2019 के दौरान कुल मिलाकर पीएम प्रदूषण में 20% से अधिक की वृद्धि हुई है. इस पूरी अवधि के दौरान इंडो-गैंगेटिक प्लेन के पूर्वी हिस्से में प्रदूषण का सबसे खतरनाक स्तर दर्ज किया गया. रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे क्षेत्र में बिहार, दक्षिण पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के एक बड़े हिस्से में प्रदूषण की स्थिति लगातार चिंताजनक बनी हुई है.

साल 2010 से 2019 के बीच इन क्षेत्रों में पीएम प्रदूषण में 10 से 40 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी देखी गई. पूर्वोत्तर भारत प्रदूषण का असमान बोझ झेल रहा विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. यहां पीएम प्रदूषण में शामिल ‘ऑर्गेनिक कार्बन’ (जैविक कार्बन) और ‘सल्फेट’ के घटकों में करीब 50 फीसदी का उछाल देखा गया है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रदूषण के ये दोनों ही घातक तत्व सीधे तौर पर ‘बायोमास बर्निंग’ (यानी लकड़ी, पराली और जैविक कचरा जलाने) से जुड़े हुए हैं. बोस संस्थान, कोलकाता के प्रो अभिजीत चटर्जी कहते हैं, “पूर्वी इंडो-गैंगेटिक प्लेन और अब धीरे-धीरे पूर्वोत्तर भारत भी प्रदूषण का असमान बोझ झेल रहा है.

इसके पीछे लगभग पूरी तरह से बायोमास जलाना जिम्मेदार है. 25 साल के डेटा में यही संकेत सबसे साफ तौर पर उभरकर सामने आया है.” पराली जलने से प्रदूषण बढ़ा, धूल में कमी अध्ययन में पाया गया है कि क्षेत्र में पीएम प्रदूषण की संरचना में स्पष्ट बदलाव आया है1 फसल अवशेष, लकड़ी और अन्य जैविक पदार्थ (बायोमास) जलाने से उत्पन्न होने वाले कार्बनयुक्त एरोसोल पूर्वी भारत और गंगा के मैदानी इलाकों में तेजी से बढ़ते दिख रहे हैं.

इसके विपरीत, पश्चिमी इंडो-गैंगेटिक प्लेन में चरम पर रहने वाला धूल प्रदूषण पूरे अध्ययन काल में घटता हुआ पाया गया है. पूर्वोत्तर भारत में पीएम में तेज वृद्धि का मुख्य कारण झूम खेती की तीव्रता और ग्रामीण घरों में घरेलू ऊर्जा के लिए बायोमास का व्यापक उपयोग है.

नतीजतन, पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर भारत का अधिकांश हिस्सा एरोसोल के मामले में प्रदूषित से अत्यधिक प्रदूषित श्रेणी में पहुंच गया है. अध्ययन में प्रदूषण हॉटस्पॉट्स में जो बदलाव आए 2000–2009 का दौर: उच्च कार्बन प्रदूषण मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तरी पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और बांग्लादेश में केंद्रित था.

2020–2024 का दौर: हॉटस्पॉट्स का विस्तार होकर यह पूरे पश्चिम बंगाल, बिहार, बांग्लादेश और असम, मेघालय व त्रिपुरा के अधिकांश हिस्सों को कवर करने लगा है. यहां अब प्रदूषण का मुख्य कारण औद्योगिक या वाहन स्रोत नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बायोमास जलाना और शहरी ठोस कचरे का दहन है.

उत्तर प्रदेश एक अपवाद: इस पूरे अध्ययन में उत्तर प्रदेश एक उल्लेखनीय अपवाद रहा, जहां हाल के वर्षों में कार्बन प्रदूषण में गिरावट दर्ज की गई है. मैदानों का प्रदूषण अब पहाड़ों तक सक्रिय (ट्रैजेक्ट्री मॉडलिंग) अध्ययन में प्रदूषण के स्रोत क्षेत्रों से हिमालयी पर्वतमाला तक पहुंचने वाले धुएं के गुच्छों की गति का पता लगाने के लिए ‘ट्रैजेक्ट्री मॉडलिंग’ का उपयोग किया गया.

इससे साफ हुआ कि इंडो-गैंगेटिक प्लेन से निकलने वाले उत्सर्जन अब सीधे हिमालय में एरोसोल (धूल, कालिख और रासायनिक कणों का वायुमंडल में निलंबन) लोडिंग को प्रभावित कर रहे हैं. पश्चिमी और मध्य हिमालय: पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (ऊपरी और मध्य IGP) से फैलने वाला प्रदूषण यहां तक पहुंच रहा है.

पूर्वी हिमालय: बिहार और पश्चिम बंगाल (निचला IGP) से निकलने वाला उत्सर्जन पूर्वी हिमालय को प्रभावित कर रहा है. इसके अलावा, हिमालयी क्षेत्रों के भीतर भी प्रदूषण का मजबूत परिवहन देखा गया है. पूर्वी हिमालयी क्षेत्र, पश्चिमी और मध्य (नेपाल) हिमालय से आने वाले प्रदूषण से बड़े पैमाने पर प्रभावित होते हैं, जबकि मध्य और पूर्वी हिमालय से निकलने वाले उत्सर्जन पूर्वोत्तर भारत को प्रभावित करते हैं.

यही कारण है कि इंडो-गैंगेटिक प्लेन और पूर्वोत्तर भारत से सटे मध्य और पूर्वी हिमालयी क्षेत्र अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक प्रदूषित पाए गए. पंजाब-बिहार पर्यावरण और जलवायु के लिहाज से बेहद संवेदनशील बोस संस्थान, कोलकाता के शोधकर्ता सौमेन रौल का कहना है- हिमालयी क्षेत्र इंडो-गैंगेटिक प्लेन में होने वाले प्रदूषण से सुरक्षित नहीं हैं.

हमारे ट्रैजेक्ट्री विश्लेषण (वायु प्रवाह के रास्तों के अध्ययन) से साफ पता चलता है कि पंजाब या बिहार से निकलने वाला धुआं सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रहता, यह बहकर सीधे पहाड़ों तक पहुंच जाता है. ये पर्यावरण और जलवायु के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र हैं, लेकिन फिलहाल ये भारत में प्रदूषण नियंत्रण या स्वच्छ हवा के लिए चलाई जा रही किसी भी व्यवस्थित योजना के दायरे से बाहर हैं.

NCAP का असर: शहरों में सुधार, पर चुनौतियां बरकरार अध्ययन ने भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत किए गए हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता का भी आकलन किया। बिहार, पश्चिम बंगाल और असम सहित कई राज्यों में NCAP लागू होने के बाद समग्र पीएम स्तरों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किए गए हैं.

हालांकि, बायोमास जलाने से होने वाला प्रदूषण इनमें से किसी भी राज्य में महत्वपूर्ण रूप से नहीं घटा है और ये क्षेत्र अब भी कार्बन युक्त एरोसोल के हॉटस्पॉट बने हुए हैं। थर्मल पावर प्लांटों, ग्रामीण बायोमास दहन और शहरी ठोस कचरा जलाने से होने वाले निरंतर उत्सर्जन ने इस कार्यक्रम की सफलता को सीमित कर दिया है.

असम का मामला विशेष रूप से चिंता का विषय असम का मामला विशेष रूप से चिंता का विषय है. NCAP लागू होने के बाद भी राज्य में सल्फेट उत्सर्जन 30% से अधिक बढ़ गया. इसकी वजह बोंगाईगांव, गुवाहाटी, डिब्रूगढ़, डिगबोई, नुमालीगढ़ और बोकाजन जैसे औद्योगिक केंद्रों में स्थित थर्मल पावर प्लांट, तेल रिफाइनरी और सीमेंट उद्योग हैं.

इसके विपरीत, कोकराझार, धुबरी और बोंगाईगांव समेत असम के कई जिलों में धूल प्रदूषण घटकर अपेक्षाकृत सुरक्षित सीमा तक आ गया है. ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण की स्थिति भयावह बोस संस्थान, कोलकाता के प्रो अभिजीत चटर्जी का कहना है- एनसीएपी वर्तमान में मुख्य रूप से शहरों पर केंद्रित है, जबकि ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण उतना ही भयावह है.

खाना पकाने, हीटिंग और खेती के लिए पराली व बायोमास जलाने पर कार्यक्रम में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता. सरकार को ग्रामीण पहलू को स्वच्छ वायु मिशन में अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए.” अध्ययन की सिफारिश: ‘NCAP 2.0’ में शामिल हों ग्रामीण और संवेदनशील क्षेत्र शोधकर्ताओं का कहना है कि आगामी ‘NCAP 2.0’ का दायरा केवल प्रदूषित शहरों तक सीमित न रहकर ग्रामीण क्षेत्रों और पर्यावरणीय रूप से अति संवेदनशील इलाकों तक बढ़ाया जाना चाहिए.

अध्ययन में कुछ क्षेत्रों को भारत के क्लीन एयर मिशन में शामिल करने की सिफारिश की गई है. सुंदरबन मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र: यह क्षेत्र पहले से ही तटीय बाढ़, कटाव और आजीविका हानि जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे में बिगड़ती वायु गुणवत्ता को नजरअंदाज करना इस क्षेत्र के लिए और भी खतरनाक होगा.

पूर्वोत्तर भारत के जैवमंडल-समृद्ध क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर हिमालयी इलाके.

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