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अंतरिक्ष उपलब्धियां और सफलताएँ देश की वैज्ञानिक क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक : मुख्यमंत्री डॉ. यादव | मुख्यमंत्री डॉ. यादव डोंगला में खगोल विज्ञान एवं अंतरिक्ष अनुसंधान पर आयोजित सत्र में हुए शामिल अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन “महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम” के

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MP Info 04 अप्रैल 2026, 08:20 pm
अंतरिक्ष उपलब्धियां और सफलताएँ देश की वैज्ञानिक क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक : मुख्यमंत्री डॉ. यादव | मुख्यमंत्री डॉ. यादव डोंगला में खगोल विज्ञान एवं अंतरिक्ष अनुसंधान पर आयोजित सत्र में हुए शामिल अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन “महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम” के

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन “महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम” के दूसरे दिन उज्जैन जिले की वराहमिहिर खगोलीय वेधशाला, डोंगला में ‘’भारत में खगोल विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान का वर्तमान और भविष्य” विषय पर आयोजित सत्र में सहभागिता की। सत्र में मुख्यमंत्री डॉ. यादव, देश की अंतरिक्ष उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं की महत्वपूर्ण जानकारियों से अवगत हुए।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत जानकारियों को अत्यंत रोचक बताते हुए भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों पर हर्ष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि चंद्रयान-3 जैसी सफलताओं पर देश के वैज्ञानिकों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की उपलब्धियाँ युवाओं को विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं।

सत्र में प्रो. अनिल भारद्वाज, निदेशक, फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL), अंतरिक्ष विभाग, अहमदाबाद ने चंद्रयान-3 मिशन की उपलब्धियों की जानकारी देते हुए बताया कि "विक्रम लैंडर" की सफल सॉफ्ट लैंडिंग भारत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि रही। इसके साथ भारत चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बना।

इस मिशन की सफलता में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने बताया कि "प्रज्ञान रोवर" ने चंद्रमा की सतह पर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन किए और इस लैंडिंग स्थल को “शिव शक्ति पॉइंट” नाम दिया गया। साथ ही उन्होंने चंद्रयान-4 (लूनर सैंपल रिटर्न मिशन), चंद्रयान-5 (LUPEX – भारत-जापान संयुक्त मिशन), वीनस ऑर्बिटर मिशन और मंगल लैंडर मिशन और वर्ष 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतारने की भारत की महत्वाकांक्षी योजनाओं की भी जानकारी दी।

सत्र में डॉ. तरुण पंत, निदेशक, स्पेस फिजिक्स लेबोरेटरी, विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर, तिरुवनंतपुरम ने आयनोस्फियर एवं ऊपरी वायुमंडल की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अंतरिक्ष की गतिविधियाँ पृथ्वी के वातावरण और जलवायु को प्रभावित करती हैं और इनका अध्ययन अंतरिक्ष विज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

खगोल विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान पर हुआ मंथन अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन “महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम” के दूसरे दिन आयोजित ‘’खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी में प्रगति’’ एवं ‘’विकसित भारत के लिए स्पेस इकोनॉमी : राष्ट्र की सेवा में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी’’ सत्रों में खगोल विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान, राष्ट्रीय सुरक्षा, स्पेस इकोनॉमी और भारतीय ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक आयाम, विज्ञान-अध्यात्म के समन्वय पर विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किए।

अंतरिक्ष तकनीक राष्ट्रीय सुरक्षा का मजबूत आधार नीति आयोग के सदस्य (विज्ञान) डॉ. वी.के. सारस्वत ने “भारत की रक्षा के लिए अंतरिक्ष आधारित रणनीतियाँ” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अंतरिक्ष तकनीक आज विकास के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है।

उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभिक प्रेरणा स्रोत का उल्लेख करते हुए बताया कि बाल्यकाल में एक सैटेलाइट प्रक्षेपण की खबर ने उन्हें अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करने की प्रेरणा दी। वैज्ञानिक डॉ. सारस्वत ने कहा कि आधुनिक समय में रक्षा तकनीक तेजी से बदल रही है और पारंपरिक हथियारों से आगे बढ़कर ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित प्रणालियाँ विकसित हो रही हैं।

उन्होंने रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र और स्टार्ट-अप्स की बढ़ती भूमिका को आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। विकसित भारत के लिए स्पेस इकोनॉमी की बढ़ती भूमिका अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में विशेषज्ञों ने स्पेस इकोनॉमी, निजी क्षेत्र की भागीदारी और युवाओं के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ते अवसरों पर चर्चा की।

सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि अंतरिक्ष तकनीक न केवल वैज्ञानिक प्रगति बल्कि आर्थिक विकास और रोजगार सृजन का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय समय की आवश्यकता राजा रामन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलॉजी (आरआरकैट) के पूर्व निदेशक डॉ. शंकर नाखे ने कहा कि विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके समन्वय से मानव समाज का संतुलित विकास संभव है।

उन्होंने कहा कि उज्जैन नगरी महाकालेश्वर मंदिर और कर्क रेखा पर स्थित होने के कारण प्राचीन काल से ही काल गणना और खगोलीय अध्ययन का केंद्र रही है, जो इस सम्मेलन की प्रासंगिकता को और अधिक सार्थक बनाता है। डॉ. नाखे ने रेडियोएक्टिव वेस्ट मैनेजमेंट और लेजर तकनीक जैसे विषयों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आधुनिक विज्ञान का उपयोग चिकित्सा, ऊर्जा और अंतरिक्ष अनुसंधान सहित अनेक क्षेत्रों में हो रहा है।

उन्होंने LIGO जैसी वैज्ञानिक परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए आधुनिक विज्ञान की सटीकता और संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म के समन्वित दृष्टिकोण से ही एक जागरूक, संतुलित और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव है।

Source:MP Info
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