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गोरखालैंड से शासन तक : दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र का नये राजनीतिक दौर में प्रवेश

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Prabhat Khabar 14 अप्रैल 2026, 09:45 am
गोरखालैंड से शासन तक : दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र का नये राजनीतिक दौर में प्रवेश

West Bengal Election 2026: दार्जिलिंग में सड़कों, पर्यटक स्थलों और कल्याणकारी योजनाओं के संकेत चिह्नों के साथ लगती दीवारों पर ‘हमें गोरखालैंड चाहिए’ के नारे की अब धुंधली तस्वीरें ही दिखाई देती है. यह इस बात का साफ संकेत है कि कैसे पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति अलग राज्य के सपने से हटकर अब शासन में रोजमर्रा की मांगों पर केंद्रित हो रही है.

कमजोर पड़ी अलग गोरखालैंड की मांग उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कर्सियोंग में दशकों से राजनीति एक अलग गोरखालैंड राज्य की मांग के वादे के इर्द-गिर्द घूमती रही, जो दशकों से क्षेत्र के लोगों से भावनात्मक रूप से जुड़ी है. यह आकांक्षा आज भी जीवित है, लेकिन अब यह पर्वतीय क्षेत्र में राजनीति की एकमात्र भाषा नहीं रह गयी है.

पर्वतीय क्षेत्र में देखने को मिल रहा बड़ा बदलाव पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले पर्वतीय क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. राजनीतिक मान्यता की पुरानी मांग अब कुछ अन्य मजबूत मांगों के साथ जुड़ गयी हैं, जैसे कि सड़कों की मरम्मत कौन करेगा, पर्यटन को कौन पुनर्जीवित करेगा, पीने के पानी की व्यवस्था कौन करेगा, स्कूलों और अस्पतालों में सुधार कौन करेगा, चाय बागानों में मजदूरी कौन बढ़ायेगा और कल्याणकारी योजनाओं के लिए पैसे कौन जारी करेगा? बंगाल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें सबसे जटिल चुनावी मुकाबला नतीजतन पर्वतीय इलाकों में गोरखालैंड के सपने और उसे साकार करने की राजनीति के बीच टकराव के कारण वर्षों में सबसे जटिल चुनावी मुकाबला देखने को मिल रहा है.

एक स्तर पर यह चुनाव राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस एवं भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (बीजीपीएम) गठबंधन और भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के बीच मुकाबला है. इसे भी पढ़ें : यह वोट नहीं, मेरे भारतीय होने का सबूत है, मुर्शिदाबाद के 6 मजदूरों की कहानी जिन्हें ‘बांग्लादेशी’ बताकर सरहद पार भेज दिया स्थायी राजनीतिक समाधान में जान डाल रही भाजपा तृणमूल समर्थित अनित थापा के नेतृत्व वाली बीजीपीएम मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि अंतहीन आंदोलनों का दौर समाप्त हो चुका है.

अब पर्वतीय इलाकों को विकास की जरूरत है. इसके उलट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक बार फिर ‘स्थायी राजनीतिक समाधान’ के भावनात्मक विचार में जान डालने की कोशिश कर रही है. वह तर्क दे रही है कि सड़कें, कल्याण और पर्यटन परियोजनाएं गोरखा पहचान के अनसुलझे प्रश्न का विकल्प नहीं बन सकती हैं.

पहले लोगों ने गोरखालैंड के सपने के लिए वोट दिया था. अब वे यह भी जानना चाहते हैं कि उनके गांव के लिए सड़क की मरम्मत कौन करेगा. कर्सियोंग के चाय बागान का कर्मचारी GNLF के हिंसक आंदोलन से GJM के उदय तक पश्चिम बंगाल में 1980 के दशक में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के हिंसक आंदोलन से लेकर बिमल गुरूंग के गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के उदय तक, पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति लंबे समय से अलग राज्य के अधूरे वादे से प्रेरित रही है.

भाजपा का 2009 के बाद इस परिदृश्य में पदार्पण हुआ. एक के बाद एक चुनाव में उसने जीजेएम और बाद में जीएनएलएफ के समर्थन से दार्जिलिंग लोकसभा सीट बरकरार रखी. साथ ही ‘स्थायी राजनीतिक समाधान’ का वादा भी किया. बार-बार किये गये वादों के पूरा नहीं होने से लोगों में निराशा पैदा हुई है.

इन वादों के प्रति उनका आकर्षण भी कम हुआ है. मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसाआईआर) ने इस निराशा को और बढ़ा दिया है. West Bengal Election 2026: बीजीपीएम के साथ पहाड़ पर पैठ बनाने की जुगत में टीएमसी इन सबके बीच तृणमूल कांग्रेस ने खुद को इस रणनीति में बड़ी चतुराई से ढाल लिया है.

पहले के चुनाव में जहां तृणमूल कांग्रेस को मुख्य रूप से एक ‘मैदानी’ पार्टी के रूप में देखा जाता था. गोरखा मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ बहुत कम थी, लेकिन अब वह बीजीपीएम के साथ अपने गठबंधन और अपनी कल्याणकारी योजनाओं की बढ़ती पहुंच का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है.

इसे भी पढ़ें : बंगाल में ममता का ‘चौका’ या भाजपा का ‘परिवर्तन’? 294 सीटों का पूरा गणित और 2 चरणों का चुनावी शेड्यूल, यहां जानें सब कुछ गोरखालैंड की भावना को कम आंक रहा तृणमूल-बीजीपीएम गठबंधन भाजपा का मानना ​​है कि तृणमूल-बीजीपीएम गठबंधन गोरखालैंड की भावना की गहराई को कम आंक रहा है.

यही कारण है कि पार्टी ने एक बार फिर पुराने सहयोगियों, पुराने प्रतीकों और पुराने वादों का सहारा लिया है. 7 सीट पर जीजेएम का भाजपा को बिना शर्त समर्थन बिमल गुरुंग के नेतृत्व वाले जीजेएम गुट ने दार्जिलिंग जिले की सभी 7 विधानसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवारों को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की और कहा कि केवल भाजपा ही स्थायी राजनीतिक समाधान दे सकती है.

भाजपा का संदेश भी उतना ही सरल है- पहचान के बिना विकास अधूरा है. पहली बार सिर्फ गोरखालैंड के मुद्दे पर नहीं लड़ा जायेगा चुनाव दशकों में पहली बार होगा, जब पर्वतीय क्षेत्र के लोग केवल गोरखालैंड के सपने पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी मतदान करेंगे कि कौन प्रशासन की जिम्मेदारी निभा सकता है.

यह एक सपने की राजनीति और उसे साकार करने की राजनीति के बीच का मुकाबला है. इसे भी पढ़ें बंगाल की सबसे लोकप्रिय नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम में कैसे दी पटखनी, पढ़ें पूरा विश्लेषण बंगाल में 91 लाख वोटर ‘गायब’, 120 सीटों का बिगड़ा गणित! SIR ने उड़ायी टीएमसी और भाजपा की नींद.

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