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हकीदत के साथ मनाया मोहर्रम का पर्व : नागाड़ो एवं ताशो के साथ निकाला 16 मोहर्रम का करवा

Posted on July 9, 2025
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मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है. इस महीने की 10 तारीख यानी आशूरा के दिन दुनियाभर में मुस्लिम समुदाय के लोग इस्लाम धर्म के आखिरी पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन की इराक के कर्बला में हुई शहादत की याद में ताजिया निकाल कर उन्हें याद करते हैं. रामपुरा तहसील मुख्यालय पर आज रविवार को मोहर्रम की 9 तारीख कत्ल की रात के अवसर पर ताजियों को इमामबाड़ा से बाहर निकाल कर ताजियो की कसावट के साथ उन्हें चौक में रखा जहां शाम को मन्नति बच्चों को विविध प्रकार के मिठाइयों में तोलकर तबररुख लोगों में बांटा गया सोमवार के दिन मुहर्रम माह की 10 तारीख को , को सभी मस्जिदों से ताजिया का चल समारोह बैंड बाजो ताशों अखाड़ों के साथ मदरबाग़ चौक पंहुचा जहा जयरिनो ने ताजियो की जियरात कर जगह-जगह ताजिये निकालकर फातिहा और तिलावत-ए-कुरआन किया गया. वहीं देर रात ताजियो का कारवा मदरबाग़ से चलकर सुबह लालबाग मैदान पंहुचा जहां सभी ताजियों की जियारत कर लोगों ने फूल माला लोबान से ताजियो की जियरात कर मन्नतें मांगी इस अवसर पर प्रति वर्ष अनुसार इस वर्ष भी हुसैनी लंगर कमेटी द्वारा सभी के लिए के लंगर का प्रोग्राम रखा गया वहीं दोपहर 2:00 बजे लालबाग से ताजियों का चल समारोह बैंड बाजे ढोल बाजे के साथ कर्बला की ओर रवाना हुआ जहां शाम होते होते सभी ताजियों को गांधी सागर जलाशय के ब्लैक वाटर एरिया में सुपुर्द ए खाक किया गया

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आलम-ए-इस्लाम की तारीख बन गई कर्बला की जंग: बता दें कि कर्बला के मैदान में नवासा ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन और उनके कुनबे को यजीद के लश्कर ने 10 मुहर्रम को शहीद कर दिया था. शहादत पाने वालों में इमाम हुसैन का छह माह का बेटा अली असगर, 18 साल का जवान अली अकबर, भाई अब्बास अलमदार, दो भांजे औनो मोहम्मद, भतीजा कासिम और दोस्त एहबाब शामिल थे. 10 मुहर्रम को हुसैन का भरा घर लूट लिया गया.

ये है पूरा वाक्या दरअसल वाक्या साल 680 (61 हिजरी) का है, इराक में यजीद नामक इस खलीफा (बादशाह) ने इमाम हुसैन को यातनाएं देना शुरू कर दिया, उनके साथ परिवार, बच्चे, बूढ़े-बुजुर्ग सहित कुल 72 लोग थे. वह कूफे शहर की ओर बढ़ रहे थे, तभी यजीद की सेना ने उन्हें बंदी बना लिया और कर्बला (इराक का प्रमुख शहर) ले गई. कर्बला में भी यजीद ने दबाव बनाया कि उसकी बात मान लें, लेकिन इमाम हुसैन ने जुल्म के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया. इसके बाद यजीद ने कर्बला के मैदान के पास बहती नहर से सातवें मुहर्रम को पानी लेने पर रोक लगा दी.

हुसैन के काफिले में 6 माह तक के बच्चे भी थे, अधिकतर महिलाएं थीं, पानी नहीं मिलने से ये लोग प्यास से तड़पने लगे. इमाम हुसैन ने यजीद की सेना से पानी मांगा, लेकिन यजीद की सेना ने शर्त मानने की बात कही. यजीद को लगा कि हुसैन और उनके साथ परिवार, बच्चे व महिलाएं टूट जाएंगे और उसकी शरण में आ जाएंगे, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ. 9वें मुहर्रम की रात हुसैन ने परिवार व अन्य लोगों को जाने की इजाजत दी और रात में रोशनी बुझा दी, लेकिन उन्होंने कुछ देर बाद जब रोशनी की तो, सभी वहीं मौजूद थे. सभी ने इमाम हुसैन का साथ देने का इरादा कर लिया. इसी रात की सुबह यानी 10वें मुहर्रम को यजीद की सेना ने हमला शुरू कर दिया. 680 (इस्लामी 61 हिजरी) को सुबह इमाम और उनके सभी साथी नमाज पढ़ रहे थे, तभी यजीद की सेना ने घेर लिया, इसके बाद हुसैन व उनके साथियों पर शाम तक हमला कर सभी को शहीद कर दिया.

क्या कहता है इतिहास : इतिहास के अनुसार, यजीद ने इमाम हुसैन के छह माह और 18 माह के बेटे को भी मारने का हुक्म दिया. इसके बाद बच्चों पर तीरों की बारिश कर दी गई. इमाम हुसैन पर भी तलवार से वार किए गए. इस तरह से हजारों यजीदी सिपाहियों ने मिलकर इमाम हुसैन सहित 72 लोगों को शहीद कर दिया. अपने हजारों फौजियों की ताकत के बावजूद यजीद, इमाम हुसैन और उनके साथियों को अपने सामने नहीं झुका सका. दीन के इन मतवालों ने झूठ के आगे सिर झुकाने की बजाय अपने सिर को कटाना बेहतर समझा और वह लड़ाई आलम-ए-इस्लाम की एक तारीख बन गई. जंग का नतीजा तो जो हुआ वह होना ही था, क्योंकि एक तरफ जहां हजरत इमाम हुसैन के साथ सिर्फ 72 आदमी थे, जबकि यजीद के साथ हजारों की फौज थी.

नतीजा यह हुआ कि जंग में एक-एक करके हजरत इमाम हुसैन के सभी साथी शहीद हो गए. आखिर में हुसैन ने भी शहादत हासिल की. इस्लामी इतिहास की इस बेमिसाल जंग ने पूरी दुनिया के मुसलमानों को एक सबक दिया कि हक की बात के लिए यदि खुद को भी कुर्बान करना पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए. वहीं मुहर्रम की 9 तारीख को हजरत इमाम हुसैन और उनके जांनिसारों की याद में ताजिए निकाले गए, मर्सिया पढ़ी गई, और जगह-जगज जलसों का आयोजन किया गया, अकीदतमंदों ने लंगर और सबील वितरित की. आज यानी मुहर्रम की11तारीख को ताजिए सुपुर्दे खाक किए गए.

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