भगवान बिरसा मुण्डा और वंदे मातरम्: राष्ट्रीय चेतना के दो स्वर – राज्यपाल मंगुभाई पटेल, Encouraging – 1

भगवान बिरसा मुण्डा और वंदे मातरम्: राष्ट्रीय चेतना के दो स्वर – राज्यपाल मंगुभाई पटेल

भगवान बिरसा मुण्डा और वंदे मातरम् पर आयोजित राष्ट्रीय चेतना के दो स्वर कार्यक्रम में राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने स्वतंत्रता संग्राम, जनजातीय चेतना और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य पर विचार रखे।

भोपाल। भगवान बिरसा मुण्डा और वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे दो स्वर हैं, जिन्होंने देश की आत्मा, चेतना और सांस्कृतिक एकता को नई ऊर्जा दी। इन्हीं दो महान प्रतीकों पर आधारित “राष्ट्रीय चेतना के दो स्वर” विषयक विचारोत्तेजक आयोजन में राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल ने कहा कि भगवान बिरसा मुण्डा का जमीनी, जन-आधारित संघर्ष और ‘वंदे मातरम्’ के वैचारिक–आध्यात्मिक स्वरों ने मिलकर स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनाधार प्रदान किया।

राज्यपाल श्री पटेल ने कहा कि इन दोनों विचारधाराओं ने आंदोलन को न केवल स्पष्ट दिशा दी, बल्कि उसमें आत्मिक शक्ति भी भरी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की विविधता में निहित शक्ति और एकता का सबसे सशक्त प्रमाण यही है कि शिक्षित, शहरी, ग्रामीण और वंचित वर्गों ने मिलकर एक स्वतंत्र राष्ट्र का स्वप्न साकार किया।

बिरसा मुण्डा

राष्ट्रीय चेतना के दो स्वर का ऐतिहासिक महत्व

“राष्ट्रीय चेतना के दो स्वर” कार्यक्रम भगवान बिरसा मुण्डा और ‘वंदे मातरम्’ के रचनाकार बंकिम चंद्र चटर्जी की 150वीं जयंती के पावन अवसर पर आयोजित किया गया। राज्यपाल ने कहा कि यह प्रकल्प भारत की आज़ादी के बहुआयामी, समावेशी और जन–जन की साझी साधना का स्मरण कराता है।

उन्होंने प्रसिद्ध पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए कहा — “तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें” — यह भाव भारत की आत्मा और चेतना का प्रतीक है, जिसमें राष्ट्र के प्रति निष्ठा, समाज के प्रति संवेदना और संस्कृति के प्रति सम्मान समाहित है।

भगवान बिरसा मुण्डा: जनजातीय चेतना के महान प्रतीक

भगवान बिरसा मुण्डा केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे जनजातीय चेतना, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक स्वाभिमान के महान प्रतीक थे। उनका नारा “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” जनजातीय समुदाय की स्वतंत्रता–आकांक्षा का उद्घोष था, जिसने जल, जंगल और जमीन पर अधिकार के साथ-साथ आत्मनिर्णय की चेतना को भी सशक्त किया।

राज्यपाल श्री पटेल ने कहा कि बिरसा मुण्डा ने स्वतंत्रता आंदोलन को ग्रामीण भारत की आत्मा तक पहुँचाया। उनका आंदोलन उलगुलान के नाम से जाना गया, जिसने अंग्रेजी शासन की नीतियों और शोषण के विरुद्ध जनजातीय समाज को संगठित किया।

उन्होंने बताया कि बिरसा मुण्डा का संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी माध्यम था। उन्होंने जनजातीय समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और आत्मसम्मान की भावना को जागृत किया।

वंदे मातरम्: स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा

राज्यपाल ने कहा कि वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक और भावनात्मक आत्मा बनकर उभरा। इस गीत ने राष्ट्रभक्ति, त्याग और बलिदान की भावना को जनमानस में प्रतिष्ठित किया और देशवासियों को मानसिक व नैतिक रूप से एकजुट किया।

उन्होंने कहा कि भारत माता की सजीव कल्पना के माध्यम से ‘वंदे मातरम्’ ने आत्मगौरव और सांस्कृतिक एकता का संचार किया। इस गीत ने स्वतंत्रता सेनानियों को संघर्ष के कठिन क्षणों में अदम्य साहस और नैतिक बल प्रदान किया।

राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल ने कहा कि भगवान बिरसा मुण्डा और ‘वंदे मातरम्’ के विचार मिलकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम को जनआंदोलन में परिवर्तित करने में सफल रहे।

विकसित भारत 2047 का संकल्प

राज्यपाल ने युवाओं से आह्वान किया कि वे इसी भाव-भावना के साथ संकल्पित होकर विकसित भारत–2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ें। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार आज़ादी के संघर्ष में हर वर्ग ने योगदान दिया, उसी प्रकार आज भी राष्ट्र निर्माण में हर नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है।

उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि उन्हें राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, समाज के प्रति संवेदना और संस्कृति के प्रति सम्मान को अपने जीवन का मूल मंत्र बनाना चाहिए।

Mangubhai C. Patel - Wikipedia

विशिष्ट अतिथियों के विचार

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ओ.पी. रावत ने कहा कि भगवान बिरसा मुण्डा जैसे जनजातीय नेतृत्व और राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक गीत की 150वीं वर्षगांठ का प्रसंग हमें उनकी जीवनी, चरित्र और गतिविधियों को अपने जीवन, चरित्र और दिनचर्या में अमल करने की प्रेरणा देता है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता श्री रमेश शर्मा ने कहा कि वंदे मातरम्, भगवान बिरसा मुण्डा का “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” और उलगुलान के सूत्र एक समान हैं। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों द्वारा किया गया अलगाव भारतीय दर्शन और विज्ञान दोनों के अनुसार अनुचित है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत के जनजातीय समुदाय के तार ऋषि-परंपरा से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि भारत में संस्कार, शिक्षा, अनुसंधान और शोध के केंद्र प्राचीन काल में वनों में ही थे। भगवान श्रीराम भी अध्ययन के लिए वन में गए थे।

सांस्कृतिक प्रस्तुति और आयोजन की झलक

विषय प्रवर्तन चिंतक-विचारक डॉ. अमोद गुप्ता ने किया। इस अवसर पर जनजातीय लोक कलाकार श्री गजेन्द्र आर्य ने भगवान बिरसा मुण्डा के व्यक्तित्व और कृतित्व का शौर्य गान प्रस्तुत कर सभी को भाव-विभोर कर दिया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों ने भगवान बिरसा मुण्डा के चित्र पर पुष्प अर्पित किए तथा दीप प्रज्ज्वलन कर शुभारंभ किया गया। आभार प्रदर्शन श्री चित्रांश खरे ने किया।

कलाव्योम फाउंडेशन द्वारा अतिथियों को स्मृति-चिह्न भेंट किए गए और इस सार्थक व विचारोत्तेजक आयोजन के लिए संस्था को हार्दिक बधाई दी गई।

निष्कर्ष

भगवान बिरसा मुण्डा और वंदे मातरम् केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज नाम नहीं हैं, बल्कि वे आज भी भारत की आत्मा और चेतना को दिशा देने वाले प्रेरणा-स्रोत हैं। उनका संघर्ष और विचारधारा यह सिखाती है कि जब राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है, तो हर वर्ग, हर समाज और हर पीढ़ी एक साथ मिलकर असंभव को भी संभव बना सकती है।

आज आवश्यकता है कि हम इन आदर्शों को केवल स्मरण न करें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारें। तभी हम सच्चे अर्थों में एक सशक्त, समावेशी और विकसित भारत का निर्माण कर सकेंगे

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