अंक, प्रमाणपत्र और रोजगार तक सीमित न हो शिक्षा

Education : भारत आज एक विचित्र शैक्षिक विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है. एक ओर देश दुनिया की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) जैसी नयी तकनीकों के युग में प्रवेश कर रहा है. दूसरी ओर हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी ऐसे विद्यार्थियों को तैयार करने में व्यस्त है, जो प्रश्न पूछने से अधिक उत्तर याद रखने में दक्ष हों.

हाल के वर्षों में नीट, जेइइ, सीयूइटी, यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर जो माहौल बना है, उसने शिक्षा को लगभग पूरी तरह एक परीक्षा उद्योग में बदल दिया है. लाखों छात्र वर्षों तक कोचिंग संस्थानों में बैठकर एक ही लक्ष्य के लिए तैयारी करते हैं-एक परीक्षा पास करना.

शिक्षा का अर्थ ज्ञान अर्जन से अधिक अंक अर्जन बन गया है. मूल प्रश्न आज भी वही है जो सदियों पहले था-क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना है, या ऐसे नागरिक तैयार करना भी, जो समाज, विज्ञान, लोकतंत्र और मानवता के भविष्य के बारे में सोच सकें? शिक्षा के दो उद्देश्य होते हैं-आंतरिक और साधनात्मक.

आंतरिक उद्देश्य व्यक्ति के विवेक, संवेदना, नैतिकता, कल्पनाशीलता और आत्मबोध का विकास है. जबकि साधनात्मक उद्देश्य शिक्षा को रोजगार, आय और आर्थिक उन्नति का माध्यम मानता है. समस्या तब शुरू होती है, जब साधनात्मक उद्देश्य पूरी शिक्षा व्यवस्था पर हावी हो जाता है.

तब विद्यार्थी यह नहीं पूछता कि ‘मैं क्या समझ रहा हूं?’ बल्कि यह पूछता है कि ‘परीक्षा में क्या पूछा जायेगा?’ उधर शिक्षक भी यह नहीं सोचता कि छात्र ने अवधारणा समझी या नहीं, बल्कि यह देखता है कि उसने उत्तर पुस्तिका में अपेक्षित शब्द लिखे या नहीं.

आज भारत के अधिकांश विद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में यही स्थिति दिखाई देती है. रैंक, कट ऑफ, प्रतिशत और पैकेज शिक्षा की गुणवत्ता के नये पैमाने बन गये हैं. जिज्ञासा, कल्पना व आलोचनात्मक चिंतन कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं. विडंबना यह है कि दुनिया तेजी से बदल रही है.

एआइ अब सेकंडों में वह जानकारी उपलब्ध करा सकती है जिसे याद करने में विद्यार्थियों को वर्षों लगते हैं. यदि मशीनें तथ्य याद रख सकती हैं, गणना कर सकती हैं और उत्तर खोज सकती हैं, तो मनुष्य की विशिष्ट क्षमता क्या होगी? निश्चित रूप से रटकर याद रखना नहीं. मनुष्य की वास्तविक शक्ति कल्पना, नवाचार, नैतिक निर्णय और जटिल समस्याओं के समाधान में है.

दुर्भाग्यवश, हमारी परीक्षा प्रणाली अब भी स्मृति को बुद्धिमत्ता मानने की भूल कर रही है. नीट और जेइइ जैसी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों छात्रों का जीवन इसका उदाहरण है. छात्र वर्षों तक प्रश्नों के पैटर्न याद करते हैं, संभावित उत्तरों का अभ्यास करते हैं और निर्धारित ढांचे के भीतर सोचने के लिए प्रशिक्षित होते हैं.

परंतु जब उनसे वास्तविक जीवन की किसी समस्या का समाधान पूछ लिया जाये, तो वे अक्सर असहज महसूस करते हैं. इसके लिए विद्यार्थी दोषी नहीं हैं, बल्कि दोष उस व्यवस्था का है जो उन्हें बचपन से यही सिखाती है कि गलती करना असफलता है. जबकि सृजनात्मकता का जन्म अक्सर गलती करने के साहस से ही होता है.

भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा इससे बिल्कुल भिन्न थी. उपनिषदों में शिक्षा संवाद के माध्यम से होती थी. शास्त्रार्थ में प्रश्न पूछना ज्ञान का आधार माना जाता था. आर्यभट्ट, चरक, सुश्रुत और पाणिनि जैसे विद्वानों ने स्थापित धारणाओं को चुनौती देकर नये ज्ञान का निर्माण किया.

वहां शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता का विकास करना था. महात्मा गांधी ने भी ‘नयी शिक्षा’ के माध्यम से इसी विचार को आगे बढ़ाया था. उनका मानना था कि शिक्षा में हाथ, हृदय और मस्तिष्क तीनों का संतुलित विकास होना चाहिए.

पर आज हमारी शिक्षा व्यवस्था मुख्यतः अंक, प्रमाणपत्र और रोजगार तक सीमित होती जा रही है. हालांकि, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता और बहुविषयक शिक्षा पर जोर देकर एक सकारात्मक दिशा दिखाई है. लेकिन नीतियां तभी सफल होती हैं जब कक्षाओं में उनका वास्तविक क्रियान्वयन हो.

यदि मूल्यांकन प्रणाली वही रहेगी, तो शिक्षण पद्धति भी नहीं बदलेगी. आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हमारे छात्र कितने तथ्य याद रख सकते हैं. यह है कि क्या वे नयी परिस्थितियों में सोच सकते हैं, किसी समस्या का नया समाधान खोज सकते हैं, गलतियों से सीख सकते हैं, और असहमति व्यक्त करने का साहस रखते हैं? इक्कीसवीं सदी में भारत को केवल इंजीनियर, डॉक्टर, प्रशासक और कर्मचारी नहीं चाहिए.

उसे वैज्ञानिक, नवप्रवर्तक, उद्यमी, लेखक, दार्शनिक और ऐसे नागरिक चाहिए जो भविष्य की कल्पना कर सकें. यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना रह जायेगा, तो हम कुशल कर्मचारी तो तैयार कर लेंगे, पर समाज को दिशा देने वाले चिंतक नहीं. संभवत: अब वह समय आ गया है कि हम अपने बच्चों से केवल यह न पूछें कि उन्होंने कितना याद किया है.

हमें यह भी पूछना चाहिए कि उन्होंने क्या समझा, क्या महसूस किया और वे दुनिया को किस तरह बेहतर बनाना चाहते हैं. संभव है कि इन प्रश्नों के बाद जो कुछ क्षणों का मौन पैदा हो, वहीं से कल्पना, सृजन और वास्तविक शिक्षा की शुरुआत होती हो. (ये लेखक के निजी विचार हैं.).

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