शनिवार (25 जुलाई) की रात ठीक 12 बजे. दिनभर नारों से गूंजने वाला जंतर-मंतर एक अलग ही कहानी लिख रहा था. मंच पर रोशनी थी, लेकिन भीड़ का रंग बदल चुका था. कहीं जीत का जश्न था, तो कहीं बैग पैक हो रहे थे. कोई अपने शहर लौटने की तैयारी में था, तो कोई आखिरी बार उस जगह को कैमरे में कैद कर रहा था, जिसने उसे उम्मीद का नया अर्थ सिखाया..
