गांधी सागर जलाशय में ठेका अनुबंध ना होने से रोजी रोटी पर मंडराया संकट: ,गांधीसागर बांध के प्रभावितों का टूटा सब्र का बांध ,कहा अब नहीं सहेंगे ,ठेका प्रणाली संपादित होने तक मछली पकड़ने के कानूनी अधिकार की मांग

रामपुरा/ गाँधी सागर । लगभग 6 दशक पूर्व बने गांधीसागर बांध से प्रभावित 52 गांव के प्रभावित आदिवासी, किसानो मछुआरे समुदाय ने बताया कि शासन द्वारा अनुबंध मूल्य में बेतहाशा वृद्धि की जाने के चलते गांधी सागर बांध जो की एक वक्त पर मीठे पानी की मछली के चलते देश-विदेश में विख्यात था आज इस गांधी सागर जलशय में कोई भी अनुबंध करता अनुबंध करने को तैयार नहीं है इसकी वजह से वर्ष 2025 •26 में मत्स्यखेट की डेड लाइन समाप्त होने के बाद मछुआरो के ऊपर रोजी-रोटी का संकट मंडराने लगा है ज्ञात हो की 15 अगस्त को मत्स्याखेट की शासन द्वारा जारी डेड लाइन{ मत्स्याखेट प्रतिबन्ध अवधि} समाप्त हो रही है ऐसे में हजारों मछुआरे अपने साजो समान तैयार कर अनुबंध होने का इंतजार कर रहे थे परंतु शासन द्वारा अनुबंध राशि बढ़ाई जाने के चलते कोई भी ठेकेदार गांधी सागर बांध में अनुबंध करने के लिए रुचि नहीं रख रहा है ऐसे में मछुआरो के सामने सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा होने लगा है गांधी सागर जलाशय में में विगत कई वर्षों से मत्स्यखेट कर अपने परिवार का लालन पोषण करने वाले मछुआरों ने जानकारी देते हुए बताया की मत्स्य महासंघ द्वारा पूर्व व्यवस्था के अनुसार ठेका संपादित होने तक स्वयं गांधी सागर जलाशय में मत्स्यखेट का संचालन करते हुए मछुआरो को मत्स्यखेट करने की अनुमति जल्द से जल्द प्रदान करनी चाहिए जब तक कोई अनुबंध नहीं हो जाता तब तक महासंघ को ही मत्स्यखेट का संचालन कर मछुआरो को राहत प्रदान करनी चाहिए इसके साथ ही मछुआरा समितियों को केज की व्यवस्था कर स्वतंत्र रूप से मछली पकडऩे की मांग रखी।
विस्थापित मछुआरो ने बताया कि बांध में हमारी पुरखों की जमीन, जायदात सब कुछ खत्म हो गया। पूर्ण रूप से सेकड़ो गांव विस्थापित हुए है लेकिन किसी भी व्यक्ति को रोजगार नहीं मिला । वैकल्पिक रोजगार के लिए विस्थापित किसान ग्रामीण बांध से मछली मार कर अपना जीवन यापन कर रहे थे लेकिन बांध में मत्स्य बीज की कमी एवं साल दर साल बढ़ते अनुबंध राशि के चलते ठेकेदारों का भी गांधी सागर जलाशय से मोह भंग होता जा रहा है जिसके चलते जलाशय में काम करने वाले हजारों मछुआरो पर रोजी-रोटी का संकट मंडराने लगा है इस वर्ष शासन की डेड लाइन समाप्त होने के बाद भी किसी भी अनुबंधकर्ता द्वारा गांधी सागर जलाशय में अनुबंध नहीं किया गया है जिससे हजारों मछुआरों को रोजी-रोटी का डर सताने लगा है मछुआरों ने बताया कि इस वर्ष अनुबंध नहीं होने से आजीविका का गंभीर संकट मंडरा गया है । शासन प्रशासन की तुगलक नीति से ठेकेदार का मोह भी अब गांधी सागर जलाशय से अब ऊब गया है । मछुआरों ने बताया कि सब कुछ छीन जाने के बाद बांध का जलाशय ही हमारी आजीविका का एकमात्र साधन है । हम किसी भी कीमत पर पानी पर अपने अधिकार को नहीं छोड़ेंगे और मछली पकडऩे का अधिकार भी हासिल करेंगे। विस्थापित किसानों मछुआरों ने कहा कि विकास के नाम पर आज से 6 दशक पूर्व जिनका सब कुछ छीन लिया गया वह आज भी वैकल्पिक रोजगार और जीवन यापन के मूलभूत अधिकार से वंचित हैं। राजस्व के नाम पर स्थानीय विस्थापित मछुआरा समुदाय से मछली पकडऩे का अधिकार छीनकर ठेकदारों को सौंप देना प्रभावितों के साथ एक और अन्याय है। जिस गाँधी सागर बांध के पानी से मध्य प्रदेश राजस्थान के अधिकांश जिलों में समृद्धि आई उसी बांध प्रभावित गांव के हजारों लोगों के सामने आज भी रोजी रोटी का संकट है। उन्होंने कहा कि पानी पर प्राथमिक अधिकार विस्थापितों का है और मछली पकडऩे का अधिकार भी। मछुआरो ने कहा कि हम सभी किसान है। बांध प्रभावितों ने कहा की हमने विकास के नाम पर अपनी जमीन नहीं दी है अब हमारे आंसू पोंछने वाला कोई नहीं है शासन प्रशासन हमारी को हमारी समस्या पर तुरंत ध्यान देते हुए रॉयल्टी के माध्यम से मत्स्यखेट का काम प्रारंभ करवाना चाहिए मत्स्यखेट का कार्य प्रारंभ ना होने की स्थिति में विस्थापित मछुआरा समुदाय ने अपने अधिकारों के लिए व्यापक आंदोलन की घोषणा की। बांध के ठेका अनुबंध नहीं होने तक मत्स्य महासंघ द्वारा मत्स्यखेट का काम प्रारंभ करना मछुआरा समितियों को मछली पकडऩे का कानूनी अधिकार सौंपने की मांग पर एक प्रतिनिधिमंडल राजधानी भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव सहित मत्स्य मंत्री से मुलाकात करेगा।