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86 साल पुराने स्वामित्व को बताया शासकीय! भाजपा कार्यकर्ता ने नगर परिषद पर लगाए गंभीर आरोप, हाईकोर्ट आदेश की अवहेलना का दावा

Posted on June 6, 2026

“**86 साल पुराने स्वामित्व को बताया शासकीय! भाजपा कार्यकर्ता ने नगर परिषद पर लगाए गंभीर आरोप, हाईकोर्ट आदेश की अवहेलना का दावा”
सब-टाइटल:
1938 की न्यायालयीन डिक्री, 1946 से नाम दर्ज, 2022 में भवन अनुमति और अब ध्वस्तीकरण नोटिस; भाजपा कार्यकर्ता बोले- ‘क्या भाजपा का कार्यकर्ता होना ही मेरा दोष है?’
मनासा। नगर परिषद की कार्रवाई को लेकर भाजपा कार्यकर्ता एवं संपत्ति स्वामी ने गंभीर सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया है कि उनकी वैध एवं वर्षों से दर्ज संपत्ति को बिना सक्षम आदेश के “शासकीय भूमि” घोषित कर दिया गया। उन्होंने दावा किया कि उनकी संपत्ति का स्वामित्व रिकॉर्ड वर्ष 1930 से लेकर वर्तमान तक लगातार उपलब्ध है और नगर परिषद स्वयं कई बार इस स्वामित्व को स्वीकार कर चुकी है।
संपत्ति स्वामी के अनुसार वर्ष 1938 में न्यायालयीन आदेश के माध्यम से उनके पूर्वजों को भूमि का स्वत्व प्राप्त हुआ था। इसके बाद वर्ष 1946 में तत्कालीन अभिलेखों में संपत्ति दर्ज हुई तथा नगर परिषद के उपलब्ध रिकॉर्ड में भी यह भूमि वर्षों तक उनके परिवार के नाम पर दर्ज रही। वर्ष 2012 में रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के आधार पर नगर परिषद ने स्वयं उनके नाम नामांतरण किया था।
“नाम हटाया तो पूर्वजों का नाम भी कैसे खत्म हो गया?”
संपत्ति स्वामी ने आरोप लगाया कि यदि उनका नामांतरण निरस्त किया गया है तो भूमि पूर्व मालिक के नाम दर्ज होनी चाहिए थी, लेकिन नगर परिषद ने सीधे भूमि को “शासकीय” दर्ज कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर उनके पूर्वजों और पूर्व मालिकों के नाम किस आदेश के तहत हटाए गए।
हाईकोर्ट आदेश की गलत व्याख्या का आरोप
उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने केवल अधिकार-क्षेत्र के प्रश्न पर टिप्पणी की थी और स्वामित्व को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया। वहीं अप्रैल 2026 के आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि स्वामित्व का निर्णय केवल दीवानी न्यायालय कर सकता है। इसके बावजूद ध्वस्तीकरण नोटिस जारी करना न्यायालय की भावना के विपरीत बताया गया है।
“फर्जी खसरा नंबर के आधार पर कार्रवाई”
संपत्ति स्वामी का दावा है कि नगर परिषद का प्रस्ताव खसरा नंबर 1277 पर आधारित है, जबकि तहसीलदार द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि ऐसा कोई खसरा नंबर मौजा मनासा में कभी अस्तित्व में ही नहीं रहा। ऐसे में पूरी कार्रवाई को उन्होंने शून्य एवं अवैध बताया।
70 लाख का निर्माण, फिर भी कार्रवाई
उन्होंने बताया कि वर्ष 2022 में नगर परिषद से वैध भवन अनुज्ञा प्राप्त करने के बाद लगभग 70 लाख रुपये खर्च कर निर्माण कराया गया। उनका आरोप है कि उसी क्षेत्र में कई अन्य निर्माण और परिवार निवासरत हैं, लेकिन कार्रवाई केवल उनके खिलाफ की जा रही है, जो समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।
नजूल भूमि पर निजी स्वत्व का दावा
संपत्ति स्वामी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में नजूल भूमि पर निजी स्वत्व को मान्यता दी गई है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 1938 की डिक्री और उसके बाद 86 वर्षों तक चले रिकॉर्ड, नामांतरण तथा भवन अनुमति स्वयं इस स्वत्व की पुष्टि करते हैं।
राजनीतिक भेदभाव का आरोप
भाजपा कार्यकर्ता ने कहा कि छुट्टी के दिन कार्रवाई किए जाने से उन्हें आशंका है कि उनके साथ राजनीतिक और व्यक्तिगत कारणों से भेदभाव किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि “मैं भाजपा मध्यप्रदेश का कार्यकर्ता हूं, शायद यही मेरा दोष है।”
जांच और न्यायिक हस्तक्षेप की मांग
संपत्ति स्वामी ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, रिकॉर्ड में किए गए परिवर्तनों की समीक्षा करने तथा न्यायालय के समक्ष वास्तविक स्थिति प्रस्तुत करने की मांग की है।**

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